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दो साल से स्कूल खंडहर, एक कमरे में 53 बच्चे—कब जागेगा बलरामपुर प्रशासन?


बलरामपुर जिले की शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल, कपोत गांव में दो साल से स्कूल भवन जर्जर, 53 बच्चों की पढ़ाई सामुदायिक भवन के छोटे कमरे में हो रही है

बलरामपुर, छत्तीसगढ़:
सरकारी योजनाओं में शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कह रही है। बलरामपुर विकासखंड के कपोत गांव का सरकारी प्राथमिक स्कूल पिछले दो वर्षों से जर्जर हालत में है। हालत इतनी खराब है कि भवन पूरी तरह अनुपयोगी हो चुका है। मजबूरी में अब बच्चों की पढ़ाई गांव के सामुदायिक भवन के एक छोटे से कमरे में हो रही है।



इस कमरे में कुल 53 बच्चों को एक साथ बैठाकर पढ़ाना शिक्षकों के लिए चुनौती बना हुआ है। शिक्षक बताते हैं कि इस वक्त कक्षा 1 से 4 तक की परीक्षाएं चल रही हैं, लेकिन जगह की कमी के कारण सभी कक्षाओं की परीक्षाएं एक साथ नहीं ली जा सकतीं। अलग-अलग समय तय कर परीक्षाएं करानी पड़ रही हैं।



नेता जी का वादा कब तक होगा पूरा

गांव में स्कूल भवन नहीं होने के सवाल पर जिला पंचायत उपाध्यक्ष धीरज सिंह देव ने कहा कि “जल्द ही” नए भवन के लिए पहल की जाएगी। वहीं, जिला शिक्षा अधिकारी का कहना है कि कपोत गांव के लिए भवन निर्माण का प्रस्ताव शासन को भेजा जा चुका है, लेकिन स्वीकृति अब तक नहीं मिली। उनका कहना है कि जैसे ही स्वीकृति आएगी, काम शुरू कर दिया जाएगा।


10 किलोमीटर दूर BEO ऑफिस, फिर भी बेखबर क्यों?

कपोत गांव का ये स्कूल विकासखंड शिक्षा अधिकारी (BEO) के कार्यालय से सिर्फ 10–15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है:

क्या विकासखंड शिक्षा अधिकारी को इस स्कूल की दुर्दशा की जानकारी नहीं थी?

अगर जानकारी थी, तो अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

क्या ग्रामीण स्कूलों की हालत तब तक नहीं सुधरती जब तक मीडिया उसे उजागर न कर दे?


“शिक्षा का अधिकार” क्या सिर्फ कागज़ों में है?

शिक्षा का अधिकार कानून हर बच्चे को 6 से 14 वर्ष की उम्र में मुफ़्त और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की गारंटी देता है। लेकिन कपोत गांव जैसे मामले इस कानून की धज्जियां उड़ाते नज़र आ रहे हैं।

प्रशासन से सीधा सवाल:

1. दो साल से स्कूल भवन जर्जर है—इस दौरान कितनी बार निरीक्षण हुआ?


2. प्रस्ताव भेजना ही पर्याप्त है या उसका फॉलोअप भी कोई ज़िम्मेदारी है?


3. जब बच्चों की पढ़ाई और परीक्षा बाधित हो रही है, तो क्या ये ‘आपात स्थिति’ नहीं मानी जानी चाहिए?



कपोत गांव का यह मामला केवल एक गांव की कहानी नहीं है। यह पूरी व्यवस्था पर सवाल है—जहां योजनाएं बनती हैं, लेकिन ज़मीन पर कुछ नहीं बदलता।

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