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बलरामपुर-रामानुजगंज में करोड़ों की शासकीय भूमि पर भूमाफियाओं का कब्जा! “फर्जी नाम, अधूरी रजिस्ट्री, सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा – किसकी छाया में फल-फूल रहे हैं भू-माफिया?”



शासकीय भूमि, मगर बेशर्मी से रजिस्ट्री!

खसरा नंबर 92 (350.78 एकड़), जिसे 1944 के सरगुजा सेटलमेंट रिकॉर्ड में गैरमजरूआ मद यानी शासकीय भूमि के रूप में दर्ज किया गया है, उसे भूमाफियाओं ने कागजों पर निजी बना दिया। न कोई पट्टा, न कोई कलेक्टर की मंजूरी — फिर भी धड़ाधड़ रजिस्ट्री होती रही। क्या छत्तीसगढ़ की राजस्व मशीनरी इतनी नासमझ है, या फिर यह सब कुछ जानबूझकर किया गया?



2017 में नायब तहसीलदार की रिपोर्ट — साफ था सब कुछ, फिर भी दबाया गया मामला

अपर कलेक्टर के निर्देश पर तत्कालीन नायब तहसीलदार ने 2017 में सात बिंदुओं में जांच कर स्पष्ट किया था — आवेदक के नाम से न दायरा पंजी में कोई प्रविष्टि है, न कोई वैध दस्तावेज। रजिस्ट्री पूरी तरह गैरकानूनी है, नामांतरण शून्य किए जाएं, और भूमि को शासकीय खाते में वापस किया जाए। लेकिन इस रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया — क्यों? किसके इशारे पर?

           बलरामपुर अपर कलेक्टर का आदेश

न्यायालय अपर कलेक्टर रामानुजगंज जिला बलरामपुर के  राजस्व अपील क्रमांक98/अ-19/2017-2018 तत्कालीन अपर कलेक्टर विजय कुमार कुजूर अपने आदेश में साफ उल्लेख किया है की छत्तीसगढ़ भू राजस्व संहिता 1959 की धारा 50 7 स्वप्रेरणा से पुनः निरीक्षण शक्ति अधिनियम बाद भूमि खसरा नंबर 257 रकबा 7.08 आरे पुराना खसरा नंबर 92/32 ,92 /41 का प्राप्त पट्टा तथाकथित पट्टा फर्जी है एवं अवैध होने के कारण उसके आधार पर दर्ज  राजस्व अभिलेख से पट्टा धारी का नाम विलोपित कर पूर्ववत शासकीय मद में दर्ज करने का आदेश पारित किया है


       कानून को ठेंगा, भ्रष्टाचार को सलाम!

छत्तीसगढ़ भू राजस्व संहिता 1959 की धारा 165(7-ख) के अनुसार, पट्टा/शासकीय भूमि की रजिस्ट्री बिना कलेक्टर की अनुमति के अवैध है। फिर भी खसरा नंबर 257/1 से लेकर 257/7 तक की ज़मीन रजिस्टर्ड होती रही, नामांतरण होता रहा। साफ तौर पर यह सरकारी तंत्र की संलिप्तता और अपराध में सहभागिता का मामला बनता है।



फर्जी नाम, अधूरे रिकॉर्ड — फाइलों में घोटाले की गूंज



क्या आप यकीन करेंगे कि खसरा नंबर 257/3 में भू-स्वामी का नाम “jyr” लिखा गया है — न पिता का नाम, न पता! वहीं 257/4 के रिकॉर्ड में “lok” के नाम पर ज़मीन दर्ज है। यह महज टाइपिंग मिस्टेक नहीं — यह सुनियोजित फर्जीवाड़ा है। इन प्रविष्टियों के पीछे कौन अधिकारी है? किसने ये रिकॉर्ड पास किए?



राजस्व विभाग — माफियाओं का नया ठिकाना?

जिला राजस्व विभाग को जनता का सेवक माना जाता है, पर यहां तो यह साफ है कि यह विभाग अब भू-माफियाओं का सबसे बड़ा सहयोगी बन चुका है। नामांतरण, रजिस्ट्री, खसरा बदलाव — सब कुछ एक इशारे पर! क्या ये सब बिना विभागीय आदेश और मिलीभगत के संभव है?



सरकार सो रही है या जानबूझकर मौन है?

प्रश्न यह नहीं है कि यह सब कैसे हुआ — प्रश्न यह है कि यह सब अब भी क्यों हो रहा है, जब जांच प्रतिवेदन मौजूद है, जब अपर कलेक्टर का आदेश है, जब भूमि रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से जमीन शासकीय है? क्या सरकार इस मामले में सिर्फ तमाशा देखेगी, या कार्रवाई करेगी?



जनता पूछ रही है — कब होगा इंसाफ?

इस पूरे प्रकरण ने यह साबित कर दिया है कि छत्तीसगढ़ में यदि आपकी जेब भारी है और संबंध मजबूत, तो आप सरकारी जमीन भी खरीद सकते हैं — बिना रोकटोक। ऐसे में आम जनता का राजस्व व्यवस्था और शासन पर से भरोसा उठना स्वाभाविक है।



अब गेंद कलेक्टर और राज्य सरकार के पाले में है। देखना होगा कि क्या यह सरकार वाकई “सुशासन” की है या फिर भू-माफियाओं की कठपुतली बन चुकी है?

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