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छत्तीसगढ़ में 100 करोड़ का सहकारी बैंक घोटाला: फर्जी खातों से हुआ बड़ा खेल, कई अधिकारी निलंबित

छत्तीसगढ़ सहकारी बैंक घोटाला: 100 करोड़ से ज्यादा की गड़बड़ी का खुलासा

छत्तीसगढ़ में कृषि लोन, धान खरीदी और केसीसी (किसान क्रेडिट कार्ड) के नाम पर किए गए 100 करोड़ से ज्यादा के घोटाले ने राज्य में हड़कंप मचा दिया है। यह घोटाला सरगुजा केंद्रीय सहकारी बैंक की 31 शाखाओं और उससे जुड़ी 150 सहकारी समितियों में हुआ। बैंक अधिकारियों, कर्मचारियों और सहकारी समितियों के लोगों ने मिलकर किसानों के नाम पर लोन और सरकारी अनुदान का गबन किया।

कैसे हुआ घोटाला?

1. फर्जी बैंक खाते खोले गए:

किसानों के नाम पर हजारों खाते खोले गए।

कई निष्क्रिय खातों (10 साल से बिना लेन-देन वाले) में अचानक बड़ी रकम डाली और निकाली गई।

30,000 से ज्यादा निष्क्रिय खातों में संदिग्ध लेन-देन हुआ।



2. फर्जीवाड़े के लिए डिजिटल पहचान का दुरुपयोग:

24,000 बैंक खातों में एक ही मोबाइल नंबर दर्ज था, जिससे घोटालेबाजों का नियंत्रण आसान हुआ।

6,000 खातों में केवाईसी (KYC) अधूरी थी, जिससे असली खाताधारक की पहचान मुश्किल हो गई।

5,000 से ज्यादा खाते एक ही पैन कार्ड पर खोले गए, जिससे पैसों के हेरफेर का रास्ता साफ हुआ।



3. धान खरीदी और किसान लोन में अनियमितता:

सरकार किसानों को धान खरीदी का भुगतान करती है, लेकिन घोटालेबाजों ने किसानों की जगह अपने बनाए फर्जी खातों में यह पैसा ट्रांसफर कर लिया।

केसीसी और अन्य कृषि लोन के नाम पर रकम निकाली गई, लेकिन असल किसानों को इसका लाभ नहीं मिला।



4. नाबार्ड की जांच से खुलासा:

नाबार्ड (NABARD) ने हाल ही में हुई एक बैठक में कुछ सहकारी समितियों के संदिग्ध लेन-देन पर सवाल उठाए।

जब सरकार ने जांच शुरू की, तो बैंक और समितियों में बड़े पैमाने पर घोटाले के सबूत मिले।

अब तक 6 बैंकों की जांच में 25 करोड़ रुपये का घोटाला सामने आ चुका है, और पूरी जांच के बाद यह आंकड़ा 100 करोड़ से भी ज्यादा हो सकता है।




अब तक की कार्रवाई:

1. बैंक और सहकारी समितियों के कई अधिकारी निलंबित और बर्खास्त:

शंकरगढ़ शाखा:

ब्रांच मैनेजर अशोक सोनी, अकाउंटेंट जगदीश प्रसाद, कंप्यूटर ऑपरेटर प्रकाश सिंह, और पूर्व प्रबंधक समल साय निलंबित।


रामानुजगंज शाखा:

तत्कालीन प्रबंधक शंकरराम भगत, कंप्यूटर ऑपरेटर और क्लर्क को सेवा से बर्खास्त किया गया।


प्रेमनगर और राजपुर शाखा:

कई अधिकारियों पर लोन में हेराफेरी, फर्जी एफडी, धनराशि समायोजन जैसे आरोप लगे, जिन पर कार्रवाई जारी है।


इन सभी अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा रही है।



2. सभी संदिग्ध खातों को फ्रीज किया गया:

24,000 खातों में गड़बड़ी मिलने के बाद लेन-देन पर रोक लगा दी गई है।

बैंक के आईटी सिस्टम को खंगाला जा रहा है कि किन खातों में धान खरीदी का फर्जी भुगतान हुआ।

3. राज्य स्तरीय जांच समिति गठित:

राज्य सरकार ने ईओडब्ल्यू (EOW – आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो) से मामले की जांच कराने का फैसला लिया है।

सहकारी बैंक की सभी शाखाओं और समितियों की गहन जांच की जा रही है।


     सरकार और प्रशासन की भूमिका

यह घोटाला भूपेश बघेल सरकार के कार्यकाल (2018-2023) में हुआ, लेकिन इसका खुलासा अब हुआ है।

अगर प्रशासन पहले ही सतर्क रहता, तो यह घोटाला इतने बड़े पैमाने पर नहीं होता।

अब राज्य सरकार जांच में तेजी ला रही है ताकि घोटालेबाजों को सजा मिल सके।


इस घोटाले का असर क्या होगा?

1. किसानों पर असर:

असली किसानों को उनकी धान की कीमत और कृषि लोन मिलने में दिक्कत होगी।

सरकार की किसान योजनाओं पर भरोसा कम होगा।


2. सहकारी बैंकों पर असर:

सहकारी बैंकों की साख गिरेगी, जिससे आम जनता का विश्वास डगमगाएगा।

बैंकिंग प्रणाली को मजबूत करने के लिए सरकार को सख्त कदम उठाने होंगे।


3. सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता की जरूरत:

किसानों को सीधे उनके बैंक खाते में पैसा मिले, इसके लिए आधार लिंकिंग और बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन को मजबूत करना होगा।

बैंकों में नियमित ऑडिट और कड़ी निगरानी जरूरी होगी ताकि भविष्य में ऐसा घोटाला न हो।

छत्तीसगढ़ का यह घोटाला बताता है कि किस तरह सरकारी योजनाओं का दुरुपयोग कर भ्रष्ट अधिकारी और कर्मचारी किसानों की मेहनत की कमाई हड़प लेते हैं। हालांकि अब सरकार और प्रशासन इस पर कार्रवाई कर रहा है, लेकिन यह सवाल उठता है कि इतनी बड़ी गड़बड़ी इतने वर्षों तक छुपी कैसे रही? क्या बैंकिंग सिस्टम की निगरानी इतनी कमजोर थी? क्या इस घोटाले में और बड़े नाम भी शामिल हो सकते हैं?

अब देखना होगा कि ईओडब्ल्यू की जांच में और कितने बड़े नाम सामने आते हैं और सरकार क्या कदम उठाती है।

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