
पटवारी ने डिजिटल दस्तावेज आधारित भूमि पंजीयन में अपनी भूमिका से अलग करने की मांग की
बलरामपुर जिले के रामानुजगंज क्षेत्र के पटवारी ने भूमि पंजीयन प्रक्रिया में लगातार बढ़ती जटिलताओं और आरोपों के बीच अपनी भूमिका से अलग करने की मांग की है। इस संबंध में उन्होंने रामानुजगंज के एसडीएम को ज्ञापन सौंपा है। पटवारी ने इसमें स्पष्ट किया है कि कार्यालय महानिरीक्षक पंजीयन एवं अधीक्षक मुद्रांक, छत्तीसगढ़ द्वारा 26 नवंबर 2020 को जारी आदेश के अनुसार, भूमि पंजीयन प्रक्रिया में डिजिटल दस्तावेज़ों को ही मान्य माना गया है।

क्या है आदेश का प्रावधान?
26 नवंबर 2020 को जारी आदेश में कहा गया है कि भूमि पंजीयन के लिए डिजिटल खसरा पांचसाला और खसरा बी-1 को मान्य दस्तावेज़ माना जाएगा। पंजीयन और नामांतरण की प्रक्रिया को भूईयां सॉफ्टवेयर के माध्यम से प्रमाणित दस्तावेज़ों पर आधारित किया जाना चाहिए। इस आदेश के तहत सभी पंजीयक और उप-पंजीयक कार्यालयों को यह निर्देशित किया गया है कि भूमि विक्रय हेतु पटवारियों से चौहद्दी प्रमाणपत्र या हस्ताक्षरित दस्तावेज़ की मांग न की जाए।

पटवारियों की भूमिका पर सवाल क्यों?
ज्ञापन में पटवारी ने उल्लेख किया है कि डिजिटल पंजीकरण प्रक्रिया लागू होने के बावजूद उनसे बार-बार चौहद्दी और अन्य हस्ताक्षरित दस्तावेज़ों की मांग की जाती है। इसके चलते उनकी कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाए जाते हैं और भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं। यह स्थिति न केवल उनके व्यक्तिगत सम्मान को ठेस पहुंचाती है, बल्कि उनकी मूल जिम्मेदारियों को भी बाधित करती है।
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पटवारी का कहना है कि डिजिटल दस्तावेज़ों और भूईयां सॉफ्टवेयर से प्रमाणित रिपोर्ट को ही रजिस्ट्री के लिए पर्याप्त माना जाना चाहिए, जैसा कि शासन के निर्देशों में कहा गया है। इसके बावजूद, अतिरिक्त दस्तावेज़ों की मांग से प्रशासनिक प्रक्रिया में अनावश्यक बाधा उत्पन्न हो रही है।
क्या है पटवारी की मांग?
ज्ञापन में पटवारी ने साफ तौर पर यह अनुरोध किया है कि उन्हें भूमि पंजीयन, चौहद्दी प्रमाणपत्र और हस्ताक्षरित दस्तावेज़ों की प्रक्रिया से अलग किया जाए। उन्होंने मांग की है कि पंजीयन प्रक्रिया को पूरी तरह से डिजिटल दस्तावेज़ों और भूईयां सॉफ्टवेयर आधारित रखा जाए।
प्रशासनिक भ्रष्टाचार और छवि पर असर
पटवारी ने आरोप लगाया है कि अतिरिक्त दस्तावेज़ों की मांग के कारण उनके ऊपर भ्रष्टाचार के झूठे आरोप लगाए जाते हैं। इससे उनकी छवि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। वे चाहते हैं कि पंजीयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और स्पष्टता सुनिश्चित हो, ताकि ऐसे आरोपों से बचा जा सके।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
इस पूरे मामले पर राजस्व विभाग के विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल पंजीकरण प्रक्रिया शासन की पारदर्शी और तकनीकी आधारित नीति का हिस्सा है। इसे प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को निर्देशों का सख्ती से पालन करना चाहिए।
अगला कदम क्या?
अब यह देखना होगा कि एसडीएम और प्रशासन पटवारी के ज्ञापन पर क्या निर्णय लेते हैं। यदि यह मांग स्वीकार की जाती है, तो यह पूरे जिले में भूमि पंजीयन प्रक्रिया को सरल और भ्रष्टाचार मुक्त बनाने में सहायक हो सकता है।
यह मामला प्रशासनिक सुधार और डिजिटल तकनीक के अधिकतम उपयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। पटवारियों की भूमिका को स्पष्ट करने और उनके काम के दायरे को सही रूप से परिभाषित करने के लिए यह आवश्यक है कि प्रशासन इस ज्ञापन पर उचित कार्रवाई करे।



