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शासन आदेश की अवहेलना, कुशमी जनपद में अब भी वेटनरी डॉक्टर सीईओ के प्रभार

बलरामपुर | शासन आदेश की अवहेलना, कुशमी जनपद में अब भी वेटनरी डॉक्टर सीईओ के प्रभार में

छत्तीसगढ़ शासन द्वारा स्पष्ट आदेश जारी किए जाने के बावजूद बलरामपुर जिले के कुशमी जनपद पंचायत में वेटनरी डॉक्टर अभिषेक पांडेय अब भी जनपद सीईओ का प्रभार संभाले हुए हैं। इससे शासन की महत्वपूर्ण योजनाओं के क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न हो रही है और प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।


शासन का आदेश स्पष्ट: “अन्य अधिकारियों को जनपद सीईओ का प्रभार न दिया जाए”

शासन ने 11 अप्रैल 2025 को आदेश क्रमांक एफ 1-32/2025/25-1 के माध्यम से सभी संभागायुक्तों, कलेक्टरों और जिला पंचायत सीईओ को निर्देशित किया था कि सहायक आयुक्त, आदिवासी विकास या जनपद पंचायत के सीईओ का प्रभार किसी अन्य अधिकारी को न सौंपा जाए। आदेश में यह भी कहा गया है कि ऐसी स्थिति न्यायालयीन विवाद को जन्म दे सकती है और विभागीय कार्यों में बाधा उत्पन्न करती है।

कांग्रेस शासन में मिली राजनीतिक पकड़, अब भी कायम

सूत्रों के अनुसार, डॉक्टर अभिषेक पाण्डेय कांग्रेस शासन काल के दौरान एक वरिष्ठ नेता और मंत्री के नजदीकी माने जाते थे। सत्ता परिवर्तन के बावजूद उनका राजनीतिक संपर्क अब भी प्रभाव में बना हुआ है। बताया जा रहा है कि वे अब भी पूर्व नेता-मंत्री की ‘आओ-भगत’ में सक्रिय नजर आते हैं। यही कारण है कि शासन के स्पष्ट निर्देश और प्रशासनिक नियमों के बावजूद वे वर्षों से जनपद पंचायत सीईओ जैसे जिम्मेदार पद पर जमे हुए हैं।

कुशमी जनपद में आदेश की अनदेखी

इसके बावजूद कुशमी जनपद पंचायत में लंबे समय से पदस्थ पशु चिकित्सक डॉ. अभिषेक पांडेय जनपद सीईओ का कार्य देख रहे हैं। शासन ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह पद द्वितीय श्रेणी का है और छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग के माध्यम से चयनित अधिकारी ही इस पर पदस्थ किए जाएं। वेटनरी डॉक्टर का इस पद पर बने रहना प्रशासनिक दृष्टिकोण से उचित नहीं माना गया है।

योजनाओं पर असर, जवाबदेही पर प्रश्न

शासन का तर्क है कि आदिवासी विकास योजनाओं सहित कई कल्याणकारी योजनाएं सीईओ जनपद पंचायत के माध्यम से लागू की जाती हैं। जब इस पद पर विभाग से बाहर के अधिकारी नियुक्त होते हैं, तो योजनाओं की पारदर्शिता, जिम्मेदारी और क्रियान्वयन प्रभावित होते हैं।

आदेश का पालन नहीं तो होगी कार्रवाई

आदेश में यह भी उल्लेख है कि यदि अपरिहार्य कारणों से किसी अधिकारी को प्रभार से हटाना हो, तो उसका प्रस्ताव शासन को भेजा जाए और अनुमति प्राप्त होने के बाद ही कार्यवाही की जाए। अन्यथा की स्थिति में प्रशासनिक लापरवाही मानी जाएगी और संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई प्रस्तावित की जाएगी।

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