ओटीपी व्यवस्था से परेशान राशन कार्डधारी: छत्तीसगढ़ में ‘चावल उत्सव’ बना ‘चावल संकट’

रायपुर छत्तीसगढ़ सरकार ने एक जून से ‘चावल उत्सव’ मनाने की घोषणा की थी। उद्देश्य था कि जून, जुलाई और अगस्त का तीन माह का राशन एक साथ दिया जाए ताकि बरसात के मौसम में लोगों को बार-बार राशन केंद्र के चक्कर न लगाने पड़ें। लेकिन हकीकत में यह उत्सव अब लोगों के लिए पीड़ा बन गया है। कारण—ओटीपी आधारित वितरण प्रणाली।
पुरानी व्यवस्था: एक मिनट में काम, नई व्यवस्था: आधा घंटा भी कम
पहले फिंगरप्रिंट (बायोमेट्रिक) से राशन वितरण होता था। सिस्टम सीधा था, लोगों को एक मिनट में राशन मिल जाता था। अब नियम बदला—फिंगरप्रिंट बंद, सिर्फ मोबाइल ओटीपी से राशन मिलेगा। नतीजा—जहां एक दिन में 150–200 लोग राशन पा लेते थे, अब बमुश्किल 10–15 को ही राशन मिल पा रहा है।
नेटवर्क-डिजिटल गैप ने तोड़ी कमर
ग्रामीण अंचलों में नेटवर्क पहले से ही कमजोर है। कई जगह मोबाइल सिग्नल ही नहीं आता, वहां मोबाइल पर ओटीपी कैसे आएगा? और अगर आ भी गया, तो 10 मिनट की वैधता वाले ओटीपी की ई-पॉश मशीन में सिर्फ 30–35 सेकंड की वैधता रह जाती है, जिससे ओटीपी बेकार हो जाता है।
“ओटीपी डालते डालते समय खत्म हो जाता है, मशीन बोलती है—’ओटीपी एक्सपायर्ड'”, शिकायत करती हैं ग्राम बासीन की सुनीता यादव, जो तीन दिन से राशन केंद्र के चक्कर लगा रही हैं।
5-6 बार ओटीपी मांग रही मशीन
एक कार्डधारी को तीन माह का राशन देने के लिए एक बार नहीं, बल्कि 5 से 6 बार अलग-अलग ओटीपी भेजे जा रहे हैं। मोबाइल नेटवर्क के भरोसे बैठी यह प्रक्रिया लोगों को झुंझलाहट और असहायता की ओर धकेल रही है।
“ओटीपी नहीं आया तो राशन नहीं मिलेगा”—यह जवाब लोगों को हर केंद्र से मिल रहा है।
ई-पॉश मशीन: सुविधा या सज़ा?
19 जून से राशन दुकानों में नई ई-पॉश मशीनें दे दी गई हैं। लेकिन इनसे फायदा कम, नुकसान ज्यादा हो रहा है। दुकानदारों के अनुसार, मशीनें हैंग हो रही हैं, सर्वर बार-बार डाउन हो रहा है। इससे एक कार्ड पर राशन देने में 20 से 30 मिनट लग रहे हैं।
“एक घंटे में दो लोगों को भी राशन नहीं दे पा रहे, तो 2100 कार्डधारियों का राशन कब पूरा होगा?” – यह सवाल करते हैं एक दुकानदार जो पिछले 6 दिन से संघर्ष कर रहे हैं।
शहर हो या गांव—हर जगह हालात खराब
रायपुर, बिलासपुर, जांजगीर-चांपा, कोरबा सहित कई शहरों और ब्लॉकों से लगातार शिकायतें मिल रही हैं। गांवों में जहां मोबाइल नेटवर्क का नामोनिशान नहीं है, वहां कार्डधारी राशन पाने के लिए मोबाइल साथ लाने पर भी असहाय हैं।
“बूढ़े लोग, मजदूर, निरक्षर महिला—ये मोबाइल, ओटीपी, नेटवर्क कैसे संभालेंगे?”—ये सवाल उठ रहे हैं, जिनका कोई जवाब शासन के पास नहीं है।
राशन न मिलने पर गुस्सा विक्रेताओं पर
विक्रेताओं का कहना है कि नियमों में बदलाव से उनके ऊपर बेवजह का दबाव बढ़ गया है। हर दिन किसी न किसी लाभार्थी से बहस हो रही है। जनता को लगता है कि दुकानदार बहाने बना रहे हैं, जबकि असली समस्या तकनीकी है।
“हम मशीन चला रहे हैं, मोबाइल नहीं चला सकते” – कहते हैं राशन विक्रेता विनोद (काल्पनिक नाम)।
235 में सिर्फ 2100 को मिला राशन
एक ब्लॉक में जहां करीब 2100 कार्डधारी हैं, वहां अब तक सिर्फ 235 लोगों को ही राशन मिल पाया है। इसी रफ्तार से अगर वितरण चलता रहा, तो तीन महीने में भी सबको राशन मिल पाएगा या नहीं, कहना मुश्किल है।
खाद्य विभाग भी मान रहा है समस्या
सहायक खाद्य अधिकारी का कहना है कि नई ई-पॉश मशीनों में सर्वर की समस्या आ रही है और इसे लेकर उच्चाधिकारियों से बातचीत चल रही है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि जल्दी समाधान निकलेगा, लेकिन कोई समयसीमा तय नहीं की गई है।
जनता की मांग: फिंगरप्रिंट सिस्टम को करें बहाल
फिंगरप्रिंट की प्रक्रिया सरल और सुलभ थी।
नेटवर्क की जरूरत नहीं पड़ती थी।
कोई ओटीपी, मोबाइल या सर्वर का झंझट नहीं था।
सरकार को चाहिए कि या तो फिंगरप्रिंट सिस्टम बहाल करे या ओटीपी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए पहले नेटवर्क और सर्वर इंफ्रास्ट्रक्चर को सुधारे। वरना ‘राशन वितरण’ एक मानवाधिकार संकट बन सकता है।


