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सुशासन तिहार के दावों की खुली पोल, बदबूदार पानी पीने को मजबूर पहाड़ी कोरवा पण्डो परिवार …..

ढोढ़ी और चूआडी का दूषित पानी पी रहे ग्रामीण, बीमारियों का बढ़ा खतरा

बलरामपुर, रामचंद्रपुर।
प्रदेश सरकार इन दिनों पूरे छत्तीसगढ़ में “सुशासन तिहार” मना रही है। मुख्यमंत्री, मंत्री, जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी गांव-गांव पहुंचकर चौपाल लगा रहे हैं। लोगों की समस्याएं सुनने और उनके त्वरित समाधान के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। लेकिन बलरामपुर जिले के रामचंद्रपुर विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत औरंगा के लोग आज की स्थिति 18वीं  सदी में रहने जेसी  तस्वीरें इन दावों की जमीनी हकीकत उजागर कर रही हैं।


ग्राम पंचायत औरंगा के  विशेष पिछड़ी जनजाति पहाड़ी कोरवाओर  पण्डो समुदाय के लोग आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले इस समुदाय को स्वच्छ पेयजल तक उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। ग्रामीणों के अनुसार गांव में पीने के पानी के लिए लोग ढोढ़ी और चूआडी पर निर्भर हैं, लेकिन वहां से निकलने वाला पानी गंदा, मटमैला और बदबूदार है। मजबूरी में ग्रामीण उसी दूषित पानी का उपयोग पीने और घरेलू कार्यों के लिए कर रहे हैं।


ग्रामीणों ने बताया कि दूषित पानी के कारण गांव में लगातार बीमारियां फैलने का खतरा बना हुआ है। कई लोग पेट दर्द, बुखार, उल्टी-दस्त और त्वचा संबंधी बीमारियों से परेशान हैं। सबसे ज्यादा दिक्कत छोटे बच्चों और बुजुर्गों को हो रही है। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को समस्या से अवगत कराया गया, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला गया।


स्थानीय लोगों का आरोप है कि शासन की योजनाएं केवल बैठकों और कागजों तक सीमित नजर आ रही हैं। एक ओर अधिकारी सुशासन तिहार के तहत चौपाल लगाकर समस्याओं के निराकरण का दावा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आदिवासी बहुल इलाकों में लोग आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। गांव की स्थिति देखकर साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि विकास और सुशासन के दावे धरातल पर कितने अधूरे हैं।


ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से मांग की है कि गांव में स्वच्छ पेयजल की तत्काल व्यवस्था की जाए और दूषित पानी की समस्या का स्थायी समाधान निकाला जाए। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए तो गांव में गंभीर स्वास्थ्य संकट खड़ा हो सकता है।


अब देखना होगा कि खबर सामने आने के बाद प्रशासन इन पहाड़ी कोरवा परिवारों की समस्याओं को गंभीरता से लेकर कोई ठोस कार्रवाई करता है या फिर सुशासन के दावे केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएंगे।

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