NH 343 रामानुजगंज में भाजयुमो कार्यकर्ताओं की सड़क पर जन्मदिन पार्टी,”कांग्रेस जिला प्रवक्ता ने पुलिस प्रशासन पर उठाएं कई सवाल”

मुख्य सचिव के आदेशों की अवहेलना, प्रशासन की निष्क्रियता पर उठे सवाल
छत्तीसगढ़ में कानून और प्रशासनिक सख्ती को लेकर दोहरे मापदंड अपनाए जाने के आरोप लग रहे हैं। हाल ही में मुख्य सचिव अमिताभ जैन द्वारा दिए गए स्पष्ट निर्देशों की अवहेलना करने वाले मामलों में प्रशासन की कार्रवाई पक्षपातपूर्ण नजर आ रही है। एक तरफ रायपुर में महापौर मीनल चौबे के पुत्र पर सख्त कार्रवाई की गई, वहीं दूसरी ओर रामानुजगंज में सत्ताधारी दल से जुड़े लोगों पर प्रशासन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
क्या है मामला?
मुख्य सचिव अमिताभ जैन ने हाल ही में प्रदेश के सभी जिलों के कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों को यह निर्देश दिया था कि कोई भी व्यक्ति सड़क पर जन्मदिन या निजी आयोजन करके यातायात बाधित करेगा तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। इस आदेश का पालन करते हुए रायपुर में महापौर मीनल चौबे के पुत्र द्वारा सड़क पर केक काटने पर कार्रवाई की गई थी।
लेकिन 1 मार्च को छत्तीसगढ़ के कृषि मंत्री रामविचार नेताम के जन्मदिन के अवसर पर रामानुजगंज में भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) के कार्यकर्ताओं ने खुलेआम सड़क पर केक काटा और आतिशबाजी की। इस पूरे घटनाक्रम की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल भी हो गईं, लेकिन स्थानीय प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की।
प्रशासन की निष्क्रियता पर कांग्रेस का हमला
कांग्रेस प्रवक्ता सुनील सिंह ने इस पूरे मामले पर सवाल उठाते हुए प्रशासन की निष्क्रियता पर नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा,
“जब रायपुर में महापौर के पुत्र पर कार्रवाई हो सकती है, तो रामानुजगंज के भाजयुमो कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? क्या रामानुजगंज पुलिस माननीय उच्च न्यायालय और मुख्य सचिव के आदेशों से भी ऊपर है? या फिर पुलिस किसी दबाव में काम कर रही है?”
उन्होंने आगे कहा कि रामानुजगंज पुलिस द्वारा इस मामले में निष्क्रियता दिखाना यह साबित करता है कि सत्ता पक्ष के कार्यकर्ताओं को बचाने के लिए प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि रामानुजगंज क्षेत्र में कई पुलिसकर्मी नियम विरुद्ध तरीके से पदस्थ किए गए हैं, और शायद यह एहसान चुकाने के लिए ही वे कार्रवाई से बच रहे हैं।
क्या पुलिस पर है राजनीतिक दबाव?
रामानुजगंज पुलिस द्वारा इस मामले में निष्क्रियता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। जहां विपक्षी दल के कार्यकर्ताओं पर त्वरित कार्रवाई होती है, वहीं सत्ता पक्ष से जुड़े लोगों को छूट देना पुलिस की कार्यशैली पर संदेह पैदा करता है।
क्या प्रशासन राजनीतिक दबाव में आकर कार्रवाई नहीं कर रहा?
क्या यह लोकतंत्र में कानून की निष्पक्षता पर सवाल नहीं खड़ा करता?
यदि पुलिस ने वास्तव में पक्षपात किया है, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार होगा?
क्या होगी आगे की कार्रवाई?
कांग्रेस ने चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन ने जल्द से जल्द इस मामले में संज्ञान नहीं लिया, तो इसे लेकर प्रदेश स्तर पर विरोध किया जाएगा। सुनील सिंह ने कहा कि वे इस मामले को हर स्तर पर उठाएंगे और जरूरत पड़ी तो न्यायालय का भी दरवाजा खटखटाया जाएगा।
यह मामला प्रशासनिक निष्पक्षता और कानून के समान अनुपालन पर एक महत्वपूर्ण बहस छेड़ता है। यदि नियम सभी के लिए समान हैं, तो फिर कार्रवाई में भेदभाव क्यों? अगर यह पक्षपात जारी रहा, तो यह जनता के बीच शासन और प्रशासन की साख को कमजोर करेगा। अब देखना यह है कि सरकार और प्रशासन इस मामले में निष्पक्ष जांच कर कार्रवाई करते हैं या इसे भी लीपापोती कर दबा दिया जाएगा।


