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सरकारी कुर्सी पर निजी हक़ – चौकी प्रभारी की अजब मोहब्बत!

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कुर्सी नहीं, मोहब्बत थी – चौकी प्रभारी ट्रांसफर के साथ कुर्सी भी ले गए!

बलरामपुर।
जहां एक ओर सरकारी दफ्तरों में ट्रांसफर के बाद कर्मचारी फाइलें छोड़ जाते हैं, वहीं बलरामपुर जिले के एक चौकी प्रभारी ने मिसाल कायम करते हुए कुर्सी भी साथ ले जाना बेहतर समझा। जी हां, चौकी प्रभारी ‘बारियों’ से ‘बलांगी’ तो ट्रांसफर हो गए, लेकिन जाते-जाते उस ‘खास’ कुर्सी को भी साथ ले गए, जिस पर बैठकर न जाने कितनी एफआईआर लिखी गई होंगी और कितनों को समझाइश दी गई होगी।

सूत्रों की मानें तो प्रभारी महोदय को इस कुर्सी से कुछ ज़्यादा ही लगाव था। खबर ये भी है कि कुर्सी के साथ उनका रिश्ता महज़ औपचारिक नहीं था, बल्कि ‘बैठकी’ का ऐसा गहरा प्रेम था कि ट्रांसफर के आदेश के साथ ही सबसे पहले कुर्सी पैक की गई।



स्थानीय लोगों का कहना है कि “ये कोई साधारण कुर्सी नहीं थी, प्रभारी जी उस पर बैठकर अलग ही तेज़ नजर आते थे। लगता था जैसे कुर्सी ने ही उन्हें प्रभारी बनाया हो।”

कुछ व्यंग्यकार इसे ‘कुर्सी प्रेम’ की नई परिभाषा मान रहे हैं, तो कुछ इसे  ‘भावनात्मक ‘ बता रहे हैं। हालांकि अभी तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन कुर्सी को लेकर उठे इस तूफान ने पूरे थाने में हड़कंप मचा दिया है।

थानेदार की कुर्सी उठाना पहली बार नहीं!
इतिहासकार बताते हैं कि भारत में ‘कुर्सी’ हमेशा से सत्ता और सम्मान का प्रतीक रही है। कुछ लोग कुर्सी पाने के लिए दौड़ लगाते हैं, तो कुछ उसे जाते-जाते भी नहीं छोड़ते।

अब देखना ये है कि बलांगी चौकी में प्रभारी महोदय उस कुर्सी पर बैठेंगे या वहां भी नई कुर्सी के साथ पुरानी यादें साझा करेंगे।

चौकी प्रभारी ने बताया कि वह मेरा निजी कुर्सी है जहां भी जाता हूं मैं अपनी कुर्सी लेकर जाता हूं।

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