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स्थानांतरण नीति पर उठते सवाल: छह वर्षों से एक ही पद पर अडिग अधिकारी”भाजपा और कांग्रेस दोनों में अभयदान”

बलरामपुर के खाद्य अधिकारी: 6 वर्षों से अडिग, अनियमितताओं और राजनीतिक संरक्षण का मामला सुर्खियों में

छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के जिला खाद्य अधिकारी एस.बी. कामठे पर छह वर्षों से एक ही स्थान पर बने रहने और विभागीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगे हैं। 2018-19 में भाजपा शासनकाल के दौरान कामठे की नियुक्ति खाद्य अधिकारी के रूप में हुई थी लेकिन मूल पद सहायक खाद्य अधिकारी (AFO) होने के बावजूद भी इतने सालों से जिला खाद्य अधिकारी का पदभार देना सोच से परे है।

इनके खिलाफ धान खरीदी, पीडीएस वितरण और केंद्रीय पूल में अस्वीकृत चावल के मामले में बार-बार अनियमितता के आरोप लगाए जा रहे हैं। इनके लंबे कार्यकाल और शासन द्वारा उन्हें “अभयदान” देने ने जनता और विभाग के कर्मचारियों के बीच असंतोष पैदा कर दिया है।


1. स्थानांतरण नीति का सवाल: छह वर्षों तक एक ही जगह?

छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा स्थापित स्थानांतरण नीति के अनुसार, अधिकारियों को एक ही स्थान पर अधिकतम 2-3 वर्षों तक ही पदस्थ रहना चाहिए। इसके बावजूद, कामठे 2019 से बलरामपुर जिले में जमे हुए हैं।

विभागीय स्तर पर लगातार नियमों की अवहेलना से यह स्पष्ट हो गया है कि कामठे के ऊपर राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण है। भाजपा और कांग्रेस दोनों के कार्यकाल में कामठे को प्रशासनिक कार्रवाई से बचाए रखा गया है।

2. विभागीय अनियमितताएँ और भ्रष्टाचार के आरोप

(i) पीडीएस वितरण और धान खरीदी में गड़बड़ी:

कामठे पर आरोप है कि उन्होंने पीडीएस दुकानदारों के साथ मिलीभगत कर खाद्य आपूर्ति तंत्र को नुकसान पहुंचाया। वहीं, धान खरीदी केंद्रों में भी किसानों को उचित लाभ नहीं मिला। शिकायतों के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई।

(ii) केंद्रीय पूल और राइस मिल सेटिंग:

जिले में  लगभग 50  राइस मिलों से आए चावल जो केंद्रीय मानकों पर अस्वीकृत हो जाते हैं, उन्हें सरकारी पूल में स्वीकृत कर लिया जाता है। इस पूरे मामले में कामठे की लंबी-चौड़ी “सेटिंग” की चर्चा हो रही है।

(iii) जनता की उपेक्षा:

रोजाना 20 से 50 शिकायतकर्ताओं के उनके कार्यालय में आने के बावजूद, कामठे अक्सर ऑफिस में अनुपस्थित रहते हैं। ‘भ्रमण’ के नाम पर उनकी गैरमौजूदगी से जनता को राशन कार्ड और अन्य जरूरी कार्यों के लिए बार-बार दौड़ना पड़ता है।

3. राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक चुप्पी

कामठे का छह वर्षों तक बलरामपुर में टिके रहना इस बात का संकेत देता है कि उनके पीछे सत्ता में बैठे प्रभावशाली लोगों का समर्थन है। चाहे भाजपा का कार्यकाल हो या कांग्रेस शासन, कामठे के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया गया। अब भाजपा सरकार के सत्ता में आने के एक साल बाद भी उनकी स्थिति जस की तस है।

कलेक्टर से भी ऊपर माने जाने वाले कामठे के रवैये ने प्रशासन और शासन की छवि पर भी प्रश्नचिह्न खड़े किए हैं।

4. पटवारियों और कर्मचारियों का आंदोलन विफल

कामठे की कार्यशैली के खिलाफ बलरामपुर के पटवारियों ने लंबे समय तक आंदोलन किया, जिसमें उनकी अनियमितताओं और गाइडलाइंस की अवहेलना पर सवाल उठाए गए। परंतु सरकार ने इस मामले में चुप्पी साधते हुए, उन्हें कार्रवाई से मुक्त रखा।


5. जनता की बढ़ती पीड़ा

कामठे के खिलाफ सबसे बड़ी शिकायत यह है कि वह लगातार भ्रमण के बहाने ऑफिस से नदारद रहते हैं। नागरिकों को राशन कार्ड बनवाने, शिकायत दर्ज कराने और खाद्य सामग्री प्राप्त करने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

6. जांच और कार्रवाई की आवश्यकता

कामठे के छह वर्षों के कार्यकाल और उनकी अनियमितताओं की उचित और निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है।

उनकी धान खरीदी प्रक्रिया,

पीडीएस वितरण प्रणाली,

केंद्रीय पूल में चावल स्वीकृत करने के मामलों को विशेष जांच के दायरे में लाना होगा।
साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि स्थानांतरण नीति का पालन किया जाए।


रामविचार नेताम जैसे क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि सरकार की योजनाओं और नीतियों को जनता तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं। लेकिन ऐसे विवादित अधिकारियों की मौजूदगी सरकार की नीयत और नीति पर सवाल खड़े करती है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण है कि बलरामपुर के जिला खाद्य अधिकारी एस.बी. कामठे के खिलाफ सरकार क्या कदम उठाएगी? क्या प्रशासनिक सुधार की दिशा में यह कोई बड़ा कदम साबित होगा, या फिर इन्हें पूर्व की तरह अभयदान देकर जनता की उम्मीदों को ठेस पहुंचाई जाएगी?

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