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फर्जी आदेश दिखाकर व्याख्याता ने कराया खुद को रिलीव, शिक्षा विभाग में मचा हड़कंप

व्याख्याता ने दिखाया फर्जी आदेश, प्राचार्य पर दबाव बनाकर कराया रिलीव

फर्जी आदेश दिखाकर व्याख्याता ने कराया खुद को रिलीव, शिक्षा विभाग में मचा हड़कंप

दूसरे जिले में ट्रांसफर का आदेश बताकर प्राचार्य पर बनाया दबाव, 11 अगस्त को हुआ कार्यमुक्त; डीईओ कार्यालय ने नहीं किया रिलीव, सत्यापन के लिए डायरेक्टर रायपुर भेजा गया आदेश

बलरामपुर जिले के शिक्षा विभाग में एक व्याख्याता द्वारा कथित तौर पर फर्जी स्थानांतरण आदेश प्रस्तुत कर स्वयं को कार्यमुक्त कराने का मामला सामने आने के बाद विभाग में हड़कंप मच गया है। मामला हाई स्कूल कानपुर में पदस्थ व्याख्याता उमेश चंद्र कौशिक से जुड़ा है। आरोप है कि व्याख्याता ने एक आदेश प्रस्तुत किया और उसके आधार पर प्राचार्य पर दबाव बनाकर खुद को कार्यमुक्त करा लिया। बताया जा रहा है कि 11 अगस्त 2026 को उन्हें कार्यमुक्त किया गया।

मामला सामने आने के बाद अब संबंधित आदेश की प्रमाणिकता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय द्वारा उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दूसरे जिले में स्थानांतरण होने की स्थिति में संबंधित शिक्षक को नियमानुसार जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के माध्यम से कार्यमुक्त किया जाना होता है। लेकिन इस मामले में जिला शिक्षा कार्यालय के रिकॉर्ड में संबंधित शिक्षक को कार्यमुक्त किए जाने का कोई मामला सामने नहीं आया है।

इसी वजह से संबंधित आदेश प्रथम दृष्टया संदिग्ध माना जा रहा है। हालांकि, विभाग ने अभी इसे अंतिम रूप से फर्जी घोषित नहीं किया है। आदेश की वास्तविकता और उसमें दर्ज विवरण की पुष्टि के लिए उसे डायरेक्टर कार्यालय, रायपुर भेजा गया है। अब सत्यापन रिपोर्ट आने के बाद ही मामले की स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी।

प्राचार्य पर दबाव बनाकर कराया कार्यमुक्त

मिली जानकारी के अनुसार, हाई स्कूल कानपुर में व्याख्याता के पद पर पदस्थ उमेश चंद्र कौशिक ने स्वयं के स्थानांतरण से संबंधित एक आदेश प्रस्तुत किया। आरोप है कि आदेश को आधार बनाकर उन्होंने विद्यालय के प्राचार्य पर दबाव बनाया और उन्हें कार्यमुक्त करने के लिए कहा।

इसके बाद 11 अगस्त 2026 को उन्हें कार्यमुक्त किए जाने की जानकारी सामने आई है। सवाल यह उठ रहा है कि यदि संबंधित शिक्षक का वास्तव में दूसरे जिले में स्थानांतरण हुआ था, तो उन्हें जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के माध्यम से कार्यमुक्त क्यों नहीं किया गया और विद्यालय स्तर पर किस आदेश के आधार पर कार्यमुक्त किया गया?

यही बिंदु अब विभागीय जांच के केंद्र में है।

डीईओ कार्यालय ने नहीं किया कार्यमुक्त

मामले की गंभीरता उस समय और बढ़ गई, जब जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय से संबंधित प्रक्रिया के बारे में जानकारी ली गई। जिला शिक्षा अधिकारी मनीराम यादव के अनुसार, यदि किसी शिक्षक का स्थानांतरण दूसरे जिले में होता है तो उसे नियमानुसार जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय से कार्यमुक्त किया जाता है।

डीईओ ने बताया कि इस मामले में कार्यालय से जानकारी लेने पर स्पष्ट हुआ कि उनके कार्यालय द्वारा संबंधित शिक्षक को इस प्रकार कार्यमुक्त नहीं किया गया है। इसके बाद प्रस्तुत किए गए आदेश की प्रमाणिकता को लेकर संदेह और गहरा गया।

डीईओ मनीराम यादव के मुताबिक, प्रथम दृष्टया संबंधित आदेश संदिग्ध प्रतीत हो रहा है। हालांकि, विभाग ने मामले में जल्दबाजी में अंतिम निष्कर्ष निकालने के बजाय आदेश को आधिकारिक सत्यापन के लिए डायरेक्टर कार्यालय, रायपुर भेजने का निर्णय लिया है।

डायरेक्टर कार्यालय रायपुर से मांगा गया सत्यापन

जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय ने कथित आदेश की प्रमाणिकता जांचने के लिए डायरेक्टर, शिक्षा विभाग, रायपुर को पत्र भेजा है। इसमें संबंधित आदेश की जांच कर यह स्पष्ट करने का अनुरोध किया गया है कि क्या वास्तव में ऐसा आदेश विभाग द्वारा जारी किया गया था या नहीं।

अब डायरेक्टर कार्यालय से मिलने वाली सत्यापन रिपोर्ट इस पूरे मामले में अहम साबित होगी। यदि सत्यापन में आदेश सही पाया जाता है तो व्याख्याता के कार्यमुक्त होने की प्रक्रिया और उसके आधार की जांच की जाएगी। वहीं, यदि आदेश फर्जी साबित होता है तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई का रास्ता साफ हो जाएगा।

ढाई लाख रुपये में आदेश तैयार कराने की चर्चा

इस पूरे मामले के बीच करीब 2 लाख 50 हजार रुपये के लेन-देन की चर्चा भी सामने आ रही है। सूत्रों के हवाले से यह दावा किया जा रहा है कि कथित आदेश तैयार कराने के लिए इतनी रकम के लेन-देन की बात कही जा रही है।

हालांकि, इस दावे की फिलहाल कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। न ही विभाग की ओर से इस संबंध में किसी प्रकार का प्रमाण सार्वजनिक किया गया है। ऐसे में इस आरोप को फिलहाल केवल चर्चा और जांच के विषय के तौर पर देखा जा रहा है। यदि विभागीय जांच में इस तरह के किसी आर्थिक लेन-देन के तथ्य सामने आते हैं, तो मामला और गंभीर हो सकता है।

आखिर किसके आदेश पर हुआ रिलीव?

मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि व्याख्याता उमेश चंद्र कौशिक को आखिर किस आदेश के आधार पर कार्यमुक्त किया गया। यदि आदेश वास्तविक था, तो उसकी आधिकारिक प्रक्रिया क्या थी? और यदि आदेश फर्जी था, तो उसे तैयार करने और उसका इस्तेमाल करने के पीछे कौन-कौन लोग शामिल थे?

इसके अलावा प्राचार्य ने किस आधार पर आदेश को स्वीकार किया और शिक्षक को कार्यमुक्त किया, यह भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है। विभाग अब इन सभी बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए मामले को देख रहा है।

विभागीय स्तर पर जांच शुरू

जिला शिक्षा अधिकारी मनीराम यादव ने बताया कि मामले में आगे की कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। उन्होंने कहा कि संबंधित आदेश को डायरेक्टर रायपुर के पास उसकी प्रमाणिकता जांचने के लिए भेजा गया है। सत्यापन रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद नियमानुसार वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।

विभागीय अधिकारियों का कहना है कि किसी भी शिक्षक या कर्मचारी को स्थानांतरण अथवा पदस्थापना से संबंधित आदेश के आधार पर कार्यमुक्त करने से पहले आदेश की प्रमाणिकता और निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाना आवश्यक है। ऐसे में यदि किसी फर्जी दस्तावेज के आधार पर सरकारी कर्मचारी ने स्वयं को कार्यमुक्त कराया है, तो यह गंभीर प्रशासनिक मामला माना जाएगा।

सत्यापन रिपोर्ट का इंतजार

फिलहाल पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी डायरेक्टर कार्यालय, रायपुर से आने वाली सत्यापन रिपोर्ट है। रिपोर्ट के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि संबंधित आदेश वास्तविक था अथवा फर्जी।

यदि जांच में आदेश फर्जी पाया जाता है, तो आदेश तैयार करने, उसका इस्तेमाल करने और उसके आधार पर कार्यमुक्त होने की पूरी प्रक्रिया की जांच की जा सकती है। साथ ही इसमें किसी अन्य अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका सामने आने पर उनके खिलाफ भी नियमानुसार कार्रवाई हो सकती है।

फिलहाल शिक्षा विभाग ने मामले में अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला है और आधिकारिक सत्यापन का इंतजार किया जा रहा है। सत्यापन रिपोर्ट आने के बाद ही यह तय होगा कि कथित फर्जी आदेश के मामले में किसके खिलाफ और किस स्तर की कार्रवाई की जाएगी।

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