“बलरामपुर में खाद्य अधिकारी की अद्भुत मजबूती, छह साल से टस से मस नहीं”

बलरामपुर में विवादित खाद्य अधिकारी: शासन-प्रशासन की निष्क्रियता का प्रतीक
बलरामपुर जिले के खाद्य अधिकारी एस.बी. कामठे बीते छह वर्षों से अपने पद पर स्थायी रूप से जमे हुए हैं, जिससे स्थानांतरण नीति और विभागीय कामकाज पर कई गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। चाहे वह भाजपा सरकार का कार्यकाल रहा हो या फिर कांग्रेस शासन, कामठे का स्थानांतरण नहीं किया गया। उनके कार्यकाल को लेकर आरोपों की सूची लंबी है, लेकिन अब तक सरकार या प्रशासन की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
भाजपा और कांग्रेस शासनकाल में निरंतर संरक्षण
एस.बी. कामठे की बलरामपुर जिले में तैनाती 2018-19 में भाजपा शासन के दौरान हुई थी। इस दौरान उन पर कई बार धान खरीदी प्रक्रिया में अनियमितताओं और पीडीएस वितरण में गड़बड़ियों के आरोप लगे। बाद में कांग्रेस सरकार बनने के बावजूद उनका स्थानांतरण नहीं किया गया। अब जबकि प्रदेश में फिर से भाजपा की सरकार बने एक वर्ष से अधिक हो चुका है, उनकी स्थिति जस की तस बनी हुई है।
इससे यह सवाल उठता है कि आखिर ऐसे कौन से राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण हैं, जो कामठे को अजेय बनाए हुए हैं?
कार्यस्थल पर अनुपस्थिति और नागरिकों की पीड़ा
खाद्य अधिकारी अक्सर कार्यालय से अनुपस्थित पाए जाते हैं। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि कामठे क्षेत्रीय भ्रमण के नाम पर कार्यालय से गायब रहते हैं। उनके पास अपनी उपस्थिति का कोई तय समय-सारणी नहीं है।
नतीजा यह है कि रोज़ाना 20 से 50 शिकायतकर्ता राशन कार्ड, पीडीएस वितरण, या अन्य जरूरी कामों के लिए उनके कार्यालय का चक्कर लगाते हैं लेकिन अधिकारी से मुलाकात संभव नहीं हो पाती। यह स्थिति सरकार की जनसेवा की प्रतिबद्धता पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
आंदोलनों और शिकायतों का कोई असर नहीं
कामठे के कार्यकाल के दौरान न केवल पटवारियों ने लंबा आंदोलन किया, बल्कि विभागीय कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों ने भी उनके खिलाफ शिकायतें दर्ज कराईं। धान खरीदी केंद्रों से लेकर पीडीएस दुकानों तक, हर जगह उनकी अनियमितता के आरोप लगाए गए। इसके बावजूद उन्हें “अभयदान” मिलता रहा।
कामठे के खिलाफ उठते सवाल
1. स्थानांतरण नीति का उल्लंघन:
छह वर्षों तक एक ही स्थान पर एक अधिकारी का बने रहना स्थानांतरण नीति के विपरीत है। इससे न केवल विभागीय निष्पक्षता प्रभावित होती है, बल्कि भ्रष्टाचार और मनमानी को भी बढ़ावा मिलता है।
2. पीडीएस वितरण और धान खरीदी में गड़बड़ी:
स्थानीय नागरिक और राशन दुकानदारों ने बार-बार शिकायत की कि खाद्य अधिकारी की अनदेखी और पक्षपाती रवैये से पीडीएस वितरण और धान खरीदी के कार्य प्रभावित हो रहे हैं।
3. कार्यालय से अनुपस्थिति:
नियमित रूप से अपने कर्तव्यों का पालन न करना, नागरिकों की समस्याओं का समाधान न करना, और ‘फील्ड विजिट’ के नाम पर गायब रहना इनकी पहचान बन गई है।
4. राजनीतिक संरक्षण का आरोप:
अधिकारी पर सत्ता में बैठी पार्टियों के नेताओं का संरक्षण प्राप्त होने की बात कही जा रही है, जो उन्हें किसी भी कार्रवाई से बचाए हुए है।
शासन-प्रशासन पर असर
कामठे का मामला शासन की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गहरा प्रभाव डालता है। यदि सरकार की योजनाएं जनता तक सही तरीके से नहीं पहुंच पा रहीं और अधिकारी मनमानी कर रहे हैं, तो इसका असर सरकार की छवि और नीतियों पर भी पड़ता है।
रामविचार नेताम जैसे जनप्रतिनिधि लगातार अपने क्षेत्र में सरकार की छवि सुधारने में लगे हैं, लेकिन ऐसे विवादित अधिकारियों के कारण सरकार की नीति और नीयत पर सवाल उठते हैं।
जनता की अपेक्षाएँ और संभावित कार्रवाई
सरकार और प्रशासन को चाहिए कि:
1. कामठे के छह वर्षों के कार्यकाल की विस्तृत जांच कराई जाए।
2. विभाग में उनके कार्यकाल के दौरान हुए फैसलों और प्रक्रियाओं की समीक्षा की जाए।
3. स्थानांतरण नीति को सख्ती से लागू करते हुए सभी अधिकारियों का नियमित स्थानांतरण सुनिश्चित किया जाए।
4. नागरिकों के द्वारा फोन लगाने के बावजूद भी फोन नहीं उठाना और ना ही उसका जवाब देना
एस.बी. कामठे का छह वर्षों तक एक ही जिले में बने रहना और लगातार आरोपों के बावजूद उनके खिलाफ कोई कार्रवाई न होना शासन और प्रशासन की नीतियों को कमजोर करता है। यह मामला न केवल बलरामपुर बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक निष्क्रियता का प्रतीक बन गया है। अब यह देखना होगा कि क्या भाजपा सरकार उनके खिलाफ कदम उठाकर अपने सुधारवादी इरादों को साकार करती है या उन्हें पूर्व की तरह संरक्षित करती है।
