बलरामपुर जिले में वन विभाग के कर्मचारियों पर गंभीर आरोप वाड्रफनगर क्षेत्र में फर्जी पट्टों के नाम पर लाखों की ठगी, ग्रामीणों में भारी आक्रोश

बलरामपुर, छत्तीसगढ़ |
छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के वाड्रफनगर विकासखंड से एक ऐसा मामला उजागर हुआ है, जिसने शासन-प्रशासन की नीतियों और पारदर्शिता की पोल खोल दी है। वन विभाग, जो प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा और ग्रामीण हित में कार्य करने का दायित्व रखता है, उसी विभाग के एक कर्मचारी पर फर्जी पट्टे जारी कर दर्जनों ग्रामीणों से लाखों रुपये की ठगी का आरोप लगा है। यह मामला सिर्फ एक कर्मचारी की लापरवाही या बेईमानी का नहीं, बल्कि एक संगठित षड्यंत्र और प्रशासनिक उदासीनता की मिसाल बनता जा रहा है।
घटना की पूरी पृष्ठभूमि: विश्वास को चोट पहुंचाने वाला घोटाला
वाड्रफनगर वन परिक्षेत्र के अंतर्गत आने वाले गोबरा और बाजरा गांव के ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि वन विभाग में कार्यरत वनपाल हरिश्चंद यादव ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए, गांव-गांव जाकर लोगों को झांसा दिया कि उन्हें वनभूमि पर वैध पट्टे दिलाए जा सकते हैं। इसके बदले उनसे नकद में मोटी रकम वसूली गई, जिसकी कोई रसीद या दस्तावेजी पुष्टि नहीं थी।
वनपाल इस काम में अकेला नहीं था। ग्रामीणों के अनुसार, फुली डूमर गांव का इम्तियाज़ खान, जो स्थानीय स्तर पर एक बिचौलिये के रूप में काम करता था, इस पूरे फर्जीवाड़े में उसका मुख्य सहयोगी था। दोनों ने मिलकर करीब 30–40 ग्रामीणों को फर्जी दस्तावेज सौंपे, जिनमें न तो विभागीय अनुज्ञा थी और न ही कोई वैधानिक आधार।

जांच में निकला सच्चाई का खुलासा
जब कुछ ग्रामीणों को शक हुआ और उन्होंने अपने “पट्टे” की वैधता की जानकारी पंचायत और राजस्व अधिकारियों से लेनी चाही, तो हकीकत सामने आई—जारी किए गए पट्टे न केवल फर्जी थे, बल्कि उनमें उपयोग की गई मुहरें और हस्ताक्षर भी नकली पाए गए। इसके बाद ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से वन विभाग और जिला प्रशासन में शिकायत दर्ज कराई।
प्रशासन की प्रतिक्रिया: सीमित और आधी अधूरी कार्रवाई
शिकायतों के बाद वन विभाग की ओर से कुछ ग्रामीणों को पैसे लौटाए गए, जिसे विभाग “भूलवश हुए त्रुटि का सुधार” कहकर पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहा है। लेकिन 25 से अधिक पीड़ित ग्रामीण ऐसे हैं, जिन्हें अब तक न तो पैसा वापस मिला है और न ही किसी प्रकार का आधिकारिक आश्वासन।

गंभीर आरोपों के बावजूद, हरिश्चंद यादव अभी भी पद पर बना हुआ है, और उसके खिलाफ कोई स्पष्ट अनुशासनात्मक कार्रवाई या FIR दर्ज नहीं की गई है।
ग्रामीणों का दर्द: शासन भरोसा मांगे, लेकिन ठग उसी की छांव में
ग्रामीणों का कहना है कि वे सरकारी योजनाओं और नियमों से अनजान हैं। जब कोई सरकारी कर्मचारी खुद वर्दी में आकर पट्टे की बात करता है, तो वे उसे भरोसेमंद मान लेते हैं। गरीब और जरूरतमंद परिवारों ने अपनी बकरी बेचकर, कर्ज लेकर, मजदूरी की बचत से पैसा दिया, ताकि उन्हें ज़मीन का अधिकार मिल सके।
ग्रामीणों की ओर से उठाई गई मांगें:
1. दोषियों के खिलाफ FIR दर्ज कर तत्काल गिरफ्तारी की जाए।
2. वसूली गई पूरी रकम ब्याज सहित वापस की जाए।
3. फर्जी पट्टों की जांच IT और राजस्व विभाग से क्रॉस-वेरिफाई करवाई जाए।
4. भविष्य में ऐसी धोखाधड़ी रोकने जमीनी स्तर पर जन-जागरूकता अभियान चलाया जाए।
प्रशासनिक दोहरापन और राजनीतिक चुप्पी
राज्य सरकार द्वारा हाल ही में ‘समस्या समाधान शिविर’ और ‘जनदर्शन’ जैसे कार्यक्रमों के जरिए यह दावा किया जा रहा है कि सरकार आम जनता की समस्याओं को प्राथमिकता से सुलझा रही है। लेकिन इस मामले में कोई मंत्री, विधायक या जनप्रतिनिधि अब तक मौके पर नहीं पहुंचे हैं। इससे यह साफ झलकता है कि नीति और व्यवहार में बड़ा अंतर है।
कानूनी और सामाजिक पहलू: क्या यह आपराधिक षड्यंत्र है?
यह मामला न केवल धोखाधड़ी (IPC 420), जालसाजी (IPC 468, 471), और आपराधिक साजिश (IPC 120B) के दायरे में आता है, बल्कि यह सरकारी पद के दुरुपयोग और जनहित के उल्लंघन का गंभीर उदाहरण भी है। यदि उच्चस्तरीय हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो यह उदाहरण भविष्य में और भी गंभीर भ्रष्टाचार को जन्म दे सकता है।
निष्कर्ष: प्रशासन को देना होगा जवाब, नहीं तो टूटेगा विश्वास
वाड्रफनगर का यह मामला न केवल बलरामपुर जिले, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के लिए आईना बन चुका है। यह सिर्फ आर्थिक ठगी नहीं, बल्कि व्यवस्था पर से जनता के भरोसे की चोट है। अगर दोषियों पर त्वरित और सख्त कार्रवाई नहीं होती, तो यह संदेश जाएगा कि सरकारी विभागों की छांव में भ्रष्टाचार सुरक्षित है।



