भाजपा कार्यकर्ताओं को अपमान, पत्रकारों पर हमला — फिर भी अफसर सुरक्षित क्यों?

रामानुजगंज का विवाद: अफसरशाही की मनमानी, कार्यकर्ताओं की अनदेखी और भाजपा नेतृत्व की चुप्पी
छत्तीसगढ़ के रामानुजगंज में भाजपा कार्यकर्ताओं और एक वरिष्ठ अधिकारी के बीच हुए विवाद ने स्थानीय राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था की पोल खोल दी है। यह सिर्फ एक अफसर और एक नेता के बीच हुई नोकझोंक का मामला नहीं है — यह उस सोच का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें सत्ता से जुड़े कुछ अधिकारी खुद को नियम-कानून से ऊपर समझते हैं, और कार्यकर्ताओं व पत्रकारों को अपमानित करने में जरा भी हिचकिचाते नहीं।
घटना का पूरा विवरण
करीब एक महीने पहले रामानुजगंज नगर पालिका में आयोजित“सुशासन तिहार” समाधान शिविर के दौरान भाजपा के प्रदेश मंत्री शैलेश गुप्ता ने PWD विभाग के (संभाग क्रमांक-2) मोहन राम भगत से जनहित से जुड़े कुछ प्रश्न पूछे। यह शिविर आम जनता की समस्याओं के समाधान के उद्देश्य से आयोजित किया गया था, लेकिन जैसे ही प्रदेश मंत्री ने अधिकारी से सवाल पीछे अधिकारी समस्याओं के समाधान सिविल छोड़कर अन्यत्र कहीं जाने लगे वैसे ही प्रदेश मंत्री ने उनके कार्यशैली पर सवाल उठाए, तो अधिकारी ने संयम खो दिया।
मौके पर मौजूद मीडिया कर्मी अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए इस पूरी घटना की रिकॉर्डिंग कर रहे थे। तभी अचानक अधिकारी ने पत्रकारों पर भी आक्रोश जताया, उन्हें अपशब्द कहे और कैमरा बंद करने की धमकी दी बल्कि मोबाइल लेकर गुस्से से सड़क पर पटक दिया। यह हरकत न सिर्फ एक जनप्रतिनिधि का अपमान थी, बल्कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर भी हमला थी।
वीडियो वायरल, पर कार्रवाई नदारद
इस घटना का वीडियो कुछ ही घंटों में सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और स्थानीय व प्रदेश स्तर के न्यूज़ चैनलों में प्रमुखता से दिखाया गया। भाजपा के रामानुजगंज मंडल अध्यक्ष सहित कई पदाधिकारियों ने अपने लेटरपैड पर इस अधिकारी को हटाने की मांग करते हुए शिकायतें पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व तक पहुंचाईं।
परंतु, एक महीने से अधिक समय बीतने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। अधिकारी आज भी वहीं पदस्थ हैं और यह प्रश्न उठा रहे हैं कि क्या पार्टी अपने ही कार्यकर्ताओं की रक्षा करने में सक्षम नहीं है?
अधिकारी पर पहले भी लग चुके हैं गंभीर आरोप
जानकारी के अनुसार, उक्त अधिकारी को पूर्व में भी अपने आचरण के कारण जेल जाना पड़ा था। लगभग 8–10 साल पहले,SDO रहते उन्हीं की आचरण की वजह से उन्हें जेल जाने की वजह से सस्पेंड किया गया था। इसके बावजूद, आज वे फिर से उसी पद पर तैनात हैं — यह अपने आप में व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।
राजनीतिक संरक्षण और निचले स्तर के कार्यकर्ताओं की अनदेखी
सबसे गंभीर बात यह है कि यह अधिकारी बार-बार रायपुर जाकर कुछ मंत्रियों से निजी तौर पर मुलाकात करता रहा है। यह संकेत देता है कि उसे राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। ऐसे में, जब ऊपर से ही संरक्षण हो, तो वह अफसर नीचे के कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को क्यों सम्मान देगा?
यह सवाल अब जोर पकड़ता जा रहा है — जब पार्टी खुद अपने निचले स्तर के कार्यकर्ताओं की बात नहीं सुनेगी, तो उनका मनोबल कैसे बना रहेगा?
कार्यकर्ताओं में गुस्सा और हताशा
रामानुजगंज क्षेत्र के भाजपा कार्यकर्ताओं में इस मुद्दे को लेकर भारी रोष है। एक तरफ उन्हें उम्मीद थी कि पार्टी उनका साथ देगी, लेकिन जब प्रदेश के स्तर पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो कार्यकर्ताओं के मन में यह भावना घर कर गई है कि शायद उनके योगदान का कोई मूल्य नहीं है।
छोटे कार्यकर्ता ही पार्टी की रीढ़ होते हैं, और जब वे खुद को उपेक्षित महसूस करने लगें, तो इसका असर पूरी पार्टी की ताकत और जमीनी पकड़ पर पड़ता है।
पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार: लोकतंत्र पर सीधा हमला
यह घटना केवल पार्टी के अंदरूनी मसले तक सीमित नहीं है। पत्रकारों के साथ इस तरह का व्यवहार निंदनीय है और यह सीधे तौर पर लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। जब कोई अधिकारी मीडिया को धमकाता है, तो यह जनता के “जानने के अधिकार” पर हमला होता है। अगर मीडिया चुप हो जाए, तो सत्ता के गलत कामों को कौन उजागर करेगा?
अब आगे क्या?
यह सवाल अब खुलकर पूछा जा रहा है — क्या भाजपा नेतृत्व इस अधिकारी पर कार्रवाई करेगा? या फिर उसे ऐसे ही संरक्षण मिलता रहेगा? यदि पार्टी ने जल्द से जल्द कोई सख्त निर्णय नहीं लिया, तो इसका असर 2028 के चुनाव तक महसूस किया जा सकता है।
जनता, पत्रकार और कार्यकर्ता अब सिर्फ कार्रवाई की प्रतीक्षा नहीं कर रहे हैं — वे नेतृत्व से जवाबदारी और ईमानदार रुख की अपेक्षा कर रहे हैं।
अगर यह मामला यूं ही दबा रहा, तो यह सिर्फ रामानुजगंज का मुद्दा नहीं रहेगा — यह पूरे प्रदेश में भाजपा की साख पर प्रश्नचिन्ह बन जाएगा। पार्टी को तय करना होगा कि वह अधिकारियों के साथ है या अपने जमीनी सिपाहियों के साथ।
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