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न्याय की मांग को लेकर प्राचार्य 8 साल के बेटे संग कलेक्ट्रेट के सामने धरने पर

ANAND MISHRA OFFICIAL PRESENTS

बलरामपुर: न्याय की मांग को लेकर प्राचार्य 8 साल के बेटे संग कलेक्ट्रेट के सामने अनिश्चितकालीन धरने पर


बलरामपुर जिला मुख्यालय में सोमवार से एक सरकारी स्कूल के प्राचार्य अपने 8 साल के बेटे को साथ लेकर कलेक्ट्रेट कार्यालय के सामने अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए हैं। धरने पर बैठे प्राचार्य का नाम राजेंद्र कुमार देवांगन है, जो हाई सेकेंडरी स्कूल बसंतपुर में पदस्थ हैं। प्राचार्य ने स्कूल प्रबंधन, कुछ शिक्षकों और शिक्षा विभाग के अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं।


राजेंद्र कुमार देवांगन को कुछ दिन पहले अनुशासनहीनता के आरोप में कमिश्नर के आदेश पर निलंबित किया गया था। प्राचार्य का कहना है कि यह कार्रवाई स्कूल के कुछ शिक्षकों की शिकायत के आधार पर की गई, जो पूरी तरह से गलत और दुर्भावनापूर्ण थी। उनका आरोप है कि शिक्षकों ने आपसी रंजिश के चलते उनके खिलाफ झूठी शिकायत की, जिसके चलते उन्हें निलंबन झेलना पड़ा।


निलंबन अवधि समाप्त होने के बाद जब वे स्कूल लौटे तो उन्हें दोबारा प्राचार्य का पदभार नहीं दिया गया। इसके बजाय एक जूनियर शिक्षक को स्कूल का प्रभारी बना दिया गया, जिसे नियमों के अनुसार यह अधिकार ही नहीं है। प्राचार्य का कहना है कि उन्होंने कई बार शिक्षा विभाग के अधिकारियों से संपर्क किया, लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई।


धरने के दौरान प्राचार्य ने अपनी व्यक्तिगत स्थिति का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी का देहांत हो चुका है और इस दुनिया में उनके साथ सिर्फ उनका 8 साल का बेटा है। उन्होंने कहा कि मजबूरी में उन्हें अपने बेटे को साथ लेकर धरने पर बैठना पड़ रहा है। प्राचार्य ने साफ कहा कि जब तक उन्हें न्याय नहीं मिलेगा और उन्हें विधिवत प्राचार्य का पदभार नहीं सौंपा जाएगा, तब तक वे धरना समाप्त नहीं करेंगे।


राजेंद्र कुमार देवांगन ने कहा कि मुझ पर जब विभागीय जाच चल रहा है और मुझे प्राचार्य का पद भार नहीं दिया जा रहा है तो जिला शिक्षा अधिकारी पर भी गंभीर आरोप लगाते हुए। उन्होंने कहा कि जिला शिक्षा अधिकारी स्वयं कई बार निलंबित हो चुके हैं और उनके खिलाफ विभागीय जांच भी चल रही है, इसके बावजूद वे जिला शिक्षा अधिकारी के पद पर बने हुए हैं। प्राचार्य का आरोप है कि जब उन्होंने इस संबंध में जिला शिक्षा अधिकारी से बात की तो अधिकारी ने राजनीतिक दबाव का हवाला देते हुए कहा कि वे उन्हें पदभार नहीं दे सकते।


इस पूरे मामले पर शिक्षा विभाग के सहायक संचालक ने सफाई दी है। उन्होंने कहा कि प्राचार्य के खिलाफ शिकायतों की जांच अभी पूरी नहीं हुई है। जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद जो भी निष्कर्ष सामने आएगा, उसके आधार पर ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल जांच पूरी होने तक प्राचार्य को पदभार नहीं दिया जा सकता।


कलेक्ट्रेट परिसर के सामने एक प्राचार्य का अपने छोटे बच्चे के साथ धरने पर बैठना जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है। आम लोगों और कर्मचारियों के बीच इस मामले को लेकर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। अब यह देखना होगा कि प्रशासन इस संवेदनशील मामले में कब और क्या निर्णय लेता है।

शिक्षा विभाग में नियमों का दोहरा मापदंड साफ दिखाई देता है। कई बार निलंबित रहे और जिन पर विभागीय जांच चल रही है, ऐसे प्राचार्यों को जिला शिक्षा अधिकारी जैसे जिम्मेदार पदों पर बैठा दिया जाता है। वहीं दूसरी ओर, जिनकी निलंबन अवधि समाप्त हो चुकी है, केवल जांच लंबित होने के आधार पर उन्हें प्राचार्य तक नहीं बनने दिया जाता।
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि एक ही विभाग में दो अलग-अलग नियम क्यों? क्या पदस्थापना योग्यता और नियमों से नहीं, बल्कि राजनीतिक संरक्षण और दबाव से तय हो रही है? यदि ऐसा है, तो यह सरकार और शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।

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