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प्रशासनिक लापरवाही से संकट में व्यवसायी, उच्च न्यायालय व कलेक्टर के आदेशों की अनदेखी से सरसों तेल मिल परियोजना ठप, घर नीलामी के कगार पर

ANAND MISHRA OFFICIAL PRESENTS

प्रशासनिक लापरवाही से संकट में व्यवसायी, उच्च न्यायालय व कलेक्टर के आदेशों की अनदेखी से सरसों तेल मिल परियोजना ठप, घर नीलामी के कगार पर


रामानुजगंज (जिला बलरामपुर-रामानुजगंज)।
तहसील कार्यालय रामानुजगंज की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला एक मामला सामने आया है। आरोप है कि राजस्व विभाग के अधिकारियों द्वारा उच्च न्यायालय और तत्कालीन कलेक्टर के आदेशों का पालन नहीं किए जाने के कारण एक स्थानीय व्यवसायी की सरसों तेल मिल परियोजना शुरू होने से पहले ही संकट में पड़ गई है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि बैंक से लिया गया ऋण चुकाने में असमर्थ होने के कारण संबंधित व्यवसायी का घर नीलामी के कगार पर पहुंच गया है।

तत्कालीन कलेक्टर के द्वारा दिया गया आदेश


भूमि विवाद से शुरू हुआ पूरा मामला
जानकारी के अनुसार नगर रामानुजगंज क्षेत्र में स्थित भूमि से संबंधित विवाद कई वर्षों से राजस्व न्यायालय में विचाराधीन रहा। इस मामले में पूर्व में तहसीलदार न्यायालय में भी सुनवाई हुई थी, जिसके बाद प्रकरण अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) न्यायालय तक पहुंचा।
बताया जाता है कि इस भूमि पर एक पक्ष लंबे समय से मकान, कुआं और कृषि कार्य कर रहा था तथा खुद को कब्जाधारी बताते हुए अपने अधिकार का दावा कर रहा था। वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों ने उक्त भूमि को अपनी पैतृक संपत्ति बताते हुए आपसी सहमति के आधार पर उसका बटवारा कराने के लिए राजस्व न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत किया था।
राजस्व निरीक्षक और हल्का पटवारी की रिपोर्ट के आधार पर संबंधित भूमि का बटवारा कर दिया गया। आरोप है कि इस प्रक्रिया में वास्तविक स्थिति का सही तरीके से मौके पर निरीक्षण नहीं किया गया और कब्जे में मौजूद भूमि को भी निजी खाते की भूमि मानकर नक्शे में शामिल कर लिया गया।

हाईकोर्ट की कापी


अपील और न्यायालयीन प्रक्रिया
इस निर्णय से प्रभावित पक्ष ने अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) न्यायालय में अपील दायर की। अपील में यह तर्क दिया गया कि जिस भूमि को बटवारे में शामिल किया गया है, वह वास्तव में शासकीय भूमि है और उस पर वर्षों से उनका कब्जा है। अपीलकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि बटवारा प्रक्रिया के दौरान उन्हें न तो पक्षकार बनाया गया और न ही कोई नोटिस या सुनवाई का अवसर दिया गया।
मामले की सुनवाई के दौरान हल्का पटवारी से जांच प्रतिवेदन भी लिया गया। जांच में यह तथ्य सामने आया कि संबंधित भूमि का रिकॉर्ड पुराना है और कई स्थानों पर नक्शे और वास्तविक कब्जे की स्थिति में अंतर है। यह भी उल्लेख किया गया कि बटवारे के समय कुछ भूमि को निजी भूमि मानकर विभाजित कर दिया गया, जबकि मौके की स्थिति अलग थी।

तहसीलदार के द्वारा जवाब


उच्च न्यायालय और कलेक्टर के आदेश
प्रकरण के आगे बढ़ने पर यह मामला उच्च स्तर तक पहुंचा। बताया जा रहा है कि तत्कालीन कलेक्टर और जिला राजस्व न्यायालय ने इस संबंध में आदेश जारी किए थे। बाद में उच्च न्यायालय ने भी मामले में आदेश पारित कर स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए थे।
लेकिन आरोप है कि इन आदेशों के बावजूद तहसील कार्यालय रामानुजगंज द्वारा भूमि अभिलेखों में आवश्यक संशोधन या प्रविष्टि नहीं की गई। खसरे में भूमि की स्थिति को शासकीय मद में दर्ज नहीं किया गया और न ही राजस्व रिकॉर्ड को अद्यतन किया गया।

पटवारी के द्वारा जवाब


व्यवसाय शुरू करने की तैयारी और नया संकट
इसी भूमि पर एक स्थानीय हितग्राही ने सरसों तेल मिल स्थापित करने की योजना बनाई थी। इसके लिए उसने पहले विधिवत प्रक्रिया अपनाते हुए अपनी भूमि का डायवर्सन करवाया। एसडीएम न्यायालय से भूमि को कृषि से व्यावसायिक उपयोग में परिवर्तित कराया गया।
इसके बाद बैंक से ऋण लेकर मशीनरी और अन्य तैयारियों की प्रक्रिया शुरू की गई ताकि क्षेत्र में सरसों तेल मिल का संचालन शुरू किया जा सके। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह मिल शुरू होने से क्षेत्र के किसानों को भी लाभ मिलता, क्योंकि उन्हें अपनी सरसों की फसल के लिए स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण की सुविधा मिलती।
लेकिन राजस्व रिकॉर्ड में भूमि की स्थिति स्पष्ट न होने और पूर्व के आदेशों का पालन न होने के कारण परियोजना अटक गई। बैंक का ऋण चुकाने का दबाव बढ़ने लगा और मिल शुरू न हो पाने से व्यवसायी आर्थिक संकट में घिर गया।
घर नीलामी की स्थिति
सूत्रों के अनुसार बैंक द्वारा दिए गए ऋण की किश्तें समय पर जमा न होने के कारण अब संबंधित व्यवसायी का घर नीलामी की स्थिति में पहुंच गया है। व्यवसायी का कहना है कि यदि समय पर प्रशासन द्वारा आदेशों का पालन कर भूमि रिकॉर्ड दुरुस्त कर दिया जाता, तो आज उसे इस स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता।


प्रशासनिक जिम्मेदारी पर सवाल


इस पूरे मामले ने तहसील कार्यालय की कार्यप्रणाली और राजस्व विभाग की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब उच्च न्यायालय और कलेक्टर स्तर से आदेश जारी हो चुके थे, तो उनका पालन सुनिश्चित करना संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी थी।
यदि समय पर आदेशों का पालन कर भूमि अभिलेखों में सुधार कर दिया जाता, तो एक संभावित उद्योग शुरू हो सकता था और एक परिवार आर्थिक संकट से बच सकता था।


जांच और कार्रवाई की मांग


अब इस मामले को लेकर स्थानीय स्तर पर जांच की मांग उठने लगी है। लोगों का कहना है कि यदि प्रशासनिक लापरवाही के कारण किसी नागरिक को आर्थिक नुकसान हुआ है, तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
फिलहाल प्रभावित पक्ष न्याय के लिए दोबारा प्रशासन और न्यायालय की शरण लेने की तैयारी कर रहा है। वहीं यह मामला राजस्व प्रशासन की कार्यप्रणाली और जवाबदेही को लेकर एक बड़ा सवाल बनकर सामने आया है।

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