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शासन के आदेश बेअसर, बलरामपुर में अब भी गैर-शैक्षणिक कार्यों में जमे 80 से अधिक शिक्षकस्कूल खाली, दफ्तर और छात्रावास भरे: बलरामपुर में शासन के आदेशों की खुली अनदेखी

शासन के आदेश कागजों में, बलरामपुर में अब भी गैर-शैक्षणिक कार्यों में जमे दर्जनों शिक्षक आश्रम-छात्रावास, मंडल संयोजक और दफ्तरों में तैनाती से स्कूलों में शिक्षकों का संकट, बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा असर


बलरामपुर-रामानुजगंज। छत्तीसगढ़ शासन द्वारा शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त कर उनके मूल पदस्थ स्कूलों में वापस भेजने के स्पष्ट निर्देश जारी किए जाने के बाद भी बलरामपुर-रामानुजगंज जिले में इन आदेशों का पूरा पालन होता नजर नहीं आ रहा है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति विकास विभाग के अंतर्गत संचालित आश्रम-छात्रावासों में प्रभारी अधीक्षक के रूप में शिक्षा विभाग के लगभग 80 से अधिक शिक्षक अब भी पदस्थ हैं। इसके अलावा कई शिक्षक बीईओ, एबीईओ, बीआरसी, मंडल संयोजक तथा अन्य प्रशासनिक दायित्व निभा रहे हैं।


शासन ने पत्र क्रमांक सा.स्था.-03/प्रभार-30/2024/13737, दिनांक 15 मार्च 2024 के माध्यम से स्पष्ट निर्देश दिए थे कि मूल शिक्षकीय पद वाले अधिकारी-कर्मचारियों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में नहीं रखा जाएगा और उन्हें उनके मूल विद्यालयों में भेजा जाएगा। प्रदेश के कई जिलों में इस दिशा में कार्रवाई भी हुई, लेकिन बलरामपुर जिले में बड़ी संख्या में शिक्षक अब भी वर्षों से गैर-शैक्षणिक पदों पर बने हुए हैं।


दस्तावेजों में 80 से अधिक प्रभारी अधीक्षक
आदिम जाति विकास विभाग की सूची में आश्रम-छात्रावासों में प्रभारी अधीक्षक के रूप में कार्यरत शिक्षकों के नाम दर्ज हैं। इनमें प्रधान पाठक, व्याख्याता, सहायक शिक्षक और शिक्षक संवर्ग के कर्मचारी शामिल हैं। कई शिक्षक अपने मूल विद्यालय से 20 से 50 किलोमीटर दूर आश्रम-छात्रावासों में प्रभारी अधीक्षक के रूप में कार्यरत हैं।
स्कूलों में शिक्षक कम, दफ्तरों में ज्यादा
शिक्षा विभाग के सूत्रों के अनुसार जिले के कई विद्यालय आज भी एकल शिक्षकीय हैं। अनेक स्कूलों में गणित, विज्ञान और अंग्रेजी जैसे विषयों के शिक्षकों की कमी बनी हुई है। ऐसे में शिक्षकों का वर्षों तक गैर-शैक्षणिक पदों पर बने रहना शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है।
मंत्री कार्यालय तक पहुंची शिक्षकों की तैनाती
हाल ही में विकासखंड शिक्षा अधिकारी, राजपुर के 17 अक्टूबर 2024 के आदेश ने भी व्यवस्था पर सवाल खड़े किए। आदेश के अनुसार प्राथमिक शाला मुरका की प्रधान पाठक श्रीमती सुरेखा सोनी को विभागीय कार्यों के लिए प्रभारी मंत्री कार्यालय में कार्य करने हेतु भारमुक्त किया गया। आलोचकों का कहना है कि जब स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, तब शिक्षकों को कार्यालयों में तैनात करना शासन की मंशा के विपरीत है।


इन पदों पर भी शिक्षकों की तैनाती
जानकारी के अनुसार जिले में कई शिक्षक वर्तमान में बीईओ, एबीईओ, बीआरसी, मंडल संयोजक, प्रयास विद्यालय, एकलव्य विद्यालय और विभिन्न प्रशासनिक इकाइयों में कार्यरत हैं। आरोप है कि इनमें से कई वर्षों से अपने मूल विद्यालयों में वापस नहीं लौटे हैं।
उठ रहे हैं सवाल
शिक्षा से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि प्रदेश के अन्य जिलों में शासन के निर्देशों का पालन करते हुए शिक्षकों को वापस स्कूल भेजा जा सकता है, तो बलरामपुर जिले में अब तक ऐसा क्यों नहीं हुआ? क्या प्रभावशाली और लंबे समय से गैर-शैक्षणिक पदों पर जमे लोगों के खिलाफ कार्रवाई होगी, या शासन के आदेश केवल कागजों तक सीमित रहेंगे?


DEO की कार्यप्रणाली पर भी सवाल
इस पूरे मामले में जिला शिक्षा अधिकारी की कार्यशैली पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि शासन के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद जिले में गैर-शैक्षणिक पदस्थापना समाप्त कराने के लिए प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। हालांकि, इस संबंध में विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाकी है।


बच्चों के भविष्य का सवाल
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जब शिक्षक विद्यालयों के बजाय कार्यालयों और छात्रावासों के प्रशासनिक कार्यों में लगे रहेंगे तो इसका सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ेगा। नई शिक्षा नीति और शिक्षा का अधिकार अधिनियम का उद्देश्य प्रत्येक बच्चे तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचाना है, लेकिन शिक्षकों की कमी इस लक्ष्य में बड़ी बाधा बन रही है।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि शासन अपने ही आदेशों का पालन सुनिश्चित कराने के लिए बलरामपुर जिले में क्या कदम उठाता है और क्या वर्षों से गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगे शिक्षकों को उनके मूल विद्यालयों में वापस भेजा जाएगा।

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