धान खरीदी में अव्यवस्था चरम पर. टोकन होने के बावजूद किसान लौटाए गए. अधिकारी खरीद से बच रहे, कई समितियों में दो से तीन दिनों से धान अटका।

धान खरीदी में अड़चनें बढ़ीं. किसानों की गाड़ी में भरा धान दो दिनों से अटका. अधिकारी जिम्मेदारी लेने से पीछे हट रहे। हड़ताल और अव्यवस्था की मार किसान झेल रहे।
छत्तीसगढ़ शासन ने इस वर्ष 15 नवंबर से धान खरीदी शुरू करने की घोषणा की थी. कई जिलों में क्षेत्रीय नेता और मंत्री खरीदी केंद्रों का शुभारंभ करते हुए बड़े स्तर पर कार्यक्रम आयोजित कर चुके हैं. इससे किसानों में उत्साह भी दिखाई दिया. लेकिन हकीकत बिल्कुल उलट है. त्रिकुंडा धान खरीदी केंद्र और बागरा उप केंद्र में किसानों को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. 15,16, 17 को टोकन होने के बावजूद न तो तौल हो रही है और न ही धान का परिदान हो रहा है.
किसान बोले: टोकन है, धान है, फिर भी हमें लौटा दिया गया

त्रिकुंडा धान खरीदी केंद्र और बागरा उप केंद्रों पर पहुंचे किसानों ने बताया कि 15,16, 17 का टोकन है हम धान भी मण्डी लेकर आय हे, लेकिन उन्हें यह कह कर वापस भेज दिया गया कि अभी खरीदी नहीं हो सकती. कुछ किसानों की गाड़ियों में दो दिनों से धान लदा हुआ पड़ा है. बारिश का खतरा और खुले में रखा धान खराब होने की संभावना उन्हें और चिंतित कर रही है.
किसानों का सवाल सीधा है. जब शासन ने साफ आदेश दे दिया है कि 15 नवंबर से खरीदी शुरू हो चुकी है, तो फिर केंद्रों पर ड्यूटी में लगाए गए अधिकारी काम क्यों नहीं कर रहे. यह स्थिति केवल त्रिकुंडा और बागरा तक सीमित नहीं है. आसपास की कई समितियों में भी यही हाल है.

अधिकारियों पर गंभीर आरोप: काम से बचने के लिए बना रहे बहाने
हड़ताल की वजह से जिला प्रशासन ने वैकल्पिक रूप से अन्य अधिकारियों को खरीदी केंद्रों पर नियुक्त किया है. पर किसान और स्थानीय सदस्य आरोप लगा रहे हैं कि अधिकारी धान खरीदी की जिम्मेदारी लेने से बच रहे. इस कारण किसानों को हर दिन “आज नहीं, कल आओ” कहा जा रहा है.
इससे स्थिति और बिगड़ रही है. किसान गाड़ियों में लदा धान लेकर चक्कर काटने को मजबूर हैं. अव्यवस्था और देरी से किसानों की आर्थिक स्थिति पर सीधा असर पड़ रहा है.
हड़ताल है मुख्य कारण, कर्मचारी अपनी लंबित मांगों पर अड़े
इस समय खाद्य विभाग और सहकारिता विभाग के लगभग 15 हजार कर्मचारी और 2739 उपार्जन केंद्रों के कंप्यूटर ऑपरेटर हड़ताल पर हैं. इनके बिना धान खरीदी का पूरा सिस्टम लगभग ठप है.
खाद्य विभाग की दो मुख्य मांगें
- सुखत राशि और लागत से जुड़े मुद्दे:
वर्ष 2023-24 और 2024-25 के धान परिदान के बाद हुई पूरी सुखत राशि समितियों को दी जाए. परिवहन के बाद होने वाली सुखत भी समितियों को मिले या फिर सप्ताह में पूरा परिवहन सुनिश्चित किया जाए.
शून्य शॉर्टेज प्रोत्साहन की व्यवस्था भी की जाए.
साथ ही कमीशन, सुरक्षा व्यय सहित अन्य खर्चों में वृद्धि की मांग की गई है.
मध्यप्रदेश की तर्ज पर उचित मूल्य दुकान विक्रेताओं को प्रतिमाह तीन हजार रुपये दिए जाएं.
खरीदी से लेकर सुखत मिलान तक पूरी जिम्मेदारी प्रशासनिक धान खरीदी अधिकारी को लिखित में दी जाए. - कंप्यूटर ऑपरेटरों का नियमितिकरण:
खरीदी नीति 2024-25 की कंडिका 11.3.3 के तहत आउटसोर्सिंग से नियुक्त कंप्यूटर ऑपरेटरों की व्यवस्था समाप्त कर उन्हें नियमित करने की मांग है.
सहकारिता विभाग की दो बड़ी मांगें
- सहकारी समितियों के लिए अनुदान:
प्रदेश की 2058 सहकारी समितियों में काम कर रहे कर्मचारियों को वेतनमान देने के लिए प्रत्येक समिति को हर वर्ष तीन लाख रुपये प्रबंधकीय अनुदान प्रदान किया जाए, जैसा मध्यप्रदेश में लागू है. - सेवा नियमों में सुधार और भर्ती में प्राथमिकता:
श्री काण्डे कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर सेवा नियम 2018 में संशोधन कर PF, DA, ESIC, और दैनिक व संविदा कर्मचारियों को भर्ती में प्राथमिकता दी जाए.
सहकारी समितियों के सहायक कर्मचारियों को बैंक केडर के प्रबंधक, तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के खाली पदों में 50 प्रतिशत कोटा मिले.
उम्र और योग्यता में भी शिथिलता दी जाए.
किसान पूछ रहे: जिम्मेदारी कौन लेगा?
स्थिति लगातार बिगड़ रही है. धान खरीदी प्रदेश की सबसे संवेदनशील प्रक्रिया है. हर दिन की देरी किसानों को भारी नुकसान पहुंचा सकती है. जहां एक ओर शासन खरीदी शुरू होने का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर केंद्रों की जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बता रही है.
अब सभी की नजरें आगामी कैबिनेट बैठक पर
कर्मचारियों की मांगों पर क्या निर्णय होगा और खरीदी कब पटरी पर लौटेगी, यह आने वाली कैबिनेट बैठक से तय होगा.
फिलहाल किसानों की मांग साफ है:
हमारी मेहनत का धान सड़क पर न सड़े. खरीदी तुरंत शुरू हो. अधिकारी जिम्मेदारी लें और सिस्टम को सही चलाएं.


