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5000 रुपये मांगने का वीडियो सामने आने के बाद भी खरीदी प्रभारी पर जांच के बाद भी नहीं हुई एफआईआर, क्या दोषियों को बचाया जा रहा है?

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बलरामपुर जिले के धान खरीदी केंद्रों में भ्रष्टाचार बेनकाब, प्रशासन की निष्क्रियता पर गंभीर सवाल

बलरामपुर जिले में धान खरीदी केंद्रों पर किसानों से अवैध वसूली का मामला लगातार तूल पकड़ता जा रहा है। जिले के कई खरीदी केंद्रों से पैसे लेने के वीडियो और शिकायतें सामने आ चुकी हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा त्रिकुंडा धान खरीदी केंद्र को लेकर हो रही है। यहां पदस्थ फर्जी खरीदी प्रभारी और उससे जुड़े अन्य लोगों पर आरोप है कि बिना रिश्वत लिए किसानों का धान नहीं खरीदा जा रहा।
त्रिकुंडा खरीदी केंद्र का एक वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुआ था, जिसमें एक किसान से 5000 रुपये की मांग किए जाने की बात सामने आई थी। वीडियो वायरल होने के बाद मामला जिला प्रशासन तक पहुंचा। इसके बाद कलेक्टर द्वारा कोऑपरेटिव विभाग के नोडल अधिकारी को जांच अधिकारी नियुक्त किया गया।


जांच अधिकारी ने मौके पर पहुंचकर पंचनामा तैयार किया, किसानों और अन्य गवाहों के बयान दर्ज किए और पूरे मामले की जांच के बाद संबंधित खरीदी प्रभारी के खिलाफ अपराध पंजीबद्ध करने की स्पष्ट अनुशंसा अपनी रिपोर्ट में की। इसके बावजूद अब तक न तो कोई एफआईआर दर्ज की गई है किया सिर्फ खानापूर्ति करने के लिए खरीदी प्रभारी को उसके पद से हटाया गया है। उच्चित कार्रवाई न होने का सीधा असर यह हुआ कि खरीदी केंद्र पर बैठे लोगों के हौसले और बढ़ गए हैं। स्थानीय किसानों का आरोप है कि अब भी धान बेचने के लिए बिचौलियों के माध्यम से पैसे देने को मजबूर किया जा रहा है। छोटे और सीमांत किसान सबसे ज्यादा परेशान हैं, जिनके पास न तो अतिरिक्त पैसे हैं और न ही प्रशासन तक बार-बार पहुंचने की क्षमता।
खरीदी केंद्र पर बिचौलियों का खुलेआम दबदबा बताया जा रहा है। आरोप है कि ये बिचौलिए प्रशासनिक संरक्षण में किसानों से अवैध वसूली कर रहे हैं। कई किसानों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पैसा न देने पर उन्हें जानबूझकर लाइन में पीछे कर दिया जाता है या गुणवत्ता के नाम पर धान रिजेक्ट कर दिया जाता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जांच अधिकारी अपनी रिपोर्ट सौंप चुका है, तब भी जिला प्रशासन द्वारा अब तक कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की गई। क्या दोषियों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है या फिर यह प्रशासनिक उदासीनता का मामला है?
धान खरीदी जैसे संवेदनशील और किसानों से सीधे जुड़े विषय में इस तरह की लापरवाही प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाती है। यदि जांच के बाद भी दोषियों पर कार्रवाई नहीं होती, तो इससे भ्रष्टाचार को खुला संरक्षण मिलने का संदेश जाता है।


अब पूरे जिले की निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं। देखना यह होगा कि प्रशासन दोषियों के खिलाफ सख्त कदम उठाकर किसानों का भरोसा बहाल करता है या फिर यह मामला भी कागजी कार्रवाई तक सीमित रह जाएगा।
किसानों का कहना है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो वे उच्च अधिकारियों तक शिकायत और आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे।

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