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पहाड़ी कोरवा की जमीन बिक्री में नियमों की धज्जियां, तहसीलदार सस्पेंड,

पहाड़ी कोरवा की जमीन हड़पने की साजिश में तहसीलदार निलंबित: आदिवासी की मौत के बाद फूटा मामला, राजस्व विभाग की शर्मनाक चुप्पी

बलरामपुर, 5 मई 2025।
छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के ग्राम भेस्की में पहाड़ी कोरवा जनजाति के एक सदस्य की जमीन धोखाधड़ी से बेच दी गई—और इससे भी शर्मनाक बात यह है कि यह काम प्रशासन की जानकारी और मिलीभगत से हुआ। नतीजा? पहाड़ी कोरवा जुबारो की मौत के बाद मामले ने तूल पकड़ा, और अब जाकर कार्रवाई हुई है।

सरगुजा संभागायुक्त नरेन्द्र कुमार दुग्गा ने तत्कालीन तहसीलदार एवं प्रभारी उप पंजीयक यशवंत कुमार को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। जांच रिपोर्ट के मुताबिक, यशवंत कुमार ने बिना सह खातेदार की सहमति और बिना कलेक्टर की पूर्व अनुमति के जुबारो की जमीन का पंजीकृत बिक्री अनुबंध शिवाराम नामक व्यक्ति के नाम कर दिया।

कानून को रौंदा गया, सिस्टम चुप रहा

छत्तीसगढ़ में पहाड़ी कोरवा, पण्डो, मझवार, और मांझी जैसी विशेष जनजातियों की जमीन की खरीद-बिक्री के लिए कलेक्टर की अनुमति अनिवार्य है। इसके बावजूद राजपुर के पंजीकरण कार्यालय में बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया के जुबारो की जमीन तीसरे पक्ष को सौंप दी गई।

इसकी न तो तहसील स्तर पर जांच हुई, न ही किसी ने सवाल उठाया—जब तक जुबारो की मौत नहीं हो गई।

संगठित अपराध, आदिवासी अधिकारों की सीधी हत्या

जांच रिपोर्ट साफ कहती है: यह कोई ‘गलती’ नहीं, सुनियोजित साजिश थी। एक गरीब आदिवासी की ज़मीन पर नज़र डालने वालों ने राजस्व विभाग के कुछ अधिकारियों को साथ मिलाकर उसे वैधानिकता का जामा पहना दिया।

किसी भी ज़िम्मेदार अफसर ने यह नहीं पूछा कि संयुक्त खाताधारी की सहमति कहाँ है? या क्या कलेक्टर से अनुमोदन लिया गया?

अब जाकर निलंबन—but क्या यही न्याय है?

यशवंत कुमार पर छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम 1965 और वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील नियम 1966 के तहत कार्रवाई की गई है। उन्हें निलंबित कर मुख्यालय सूरजपुर भेज दिया गया है और जीवन निर्वाह भत्ता दिया जाएगा।

लेकिन सवाल यह है—

01 क्या एक आदिवासी की ज़मीन छीनने और उसकी मौत के बाद ‘जीवन निर्वाह भत्ता’ ही न्याय है?

02  क्या ये कार्रवाई उन अन्य अधिकारियों तक पहुंचेगी जो इस पूरे खेल में मौन समर्थक बने रहे?

कब तक अपनी ही ज़मीन पर बेगाना रहेगा आदिवासी?

बलरामपुर का यह मामला सिर्फ एक घटना नहीं—यह राज्य भर में फैली उस गहरी सड़ी हुई व्यवस्था का प्रतीक है जो आज भी आदिवासियों को उनके हक़ से महरूम रखती है। पहाड़ी कोरवा जैसे समुदाय संविधान से संरक्षण तो पाते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि उनकी ज़मीनें बिकती रहती हैं, और सिस्टम आंख मूंदे रहता है।

इस पूरे प्रकरण ने छत्तीसगढ़ शासन के राजस्व और आदिवासी कल्याण विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ज़रूरत है कि अब सिर्फ निलंबन से आगे बढ़कर आपराधिक मुकदमा चलाया जाए और दोषियों को जेल भेजा जाए।

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