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जिनको सरकार ने भेजा है व्यवस्था बनाने के लिए वो तो बन गए मूक समर्थक

बलरामपुर जिले में सरकारी गाड़ियों का खुलेआम दुरुपयोग हो रहा है। नियम साफ कहते हैं कि अधिकारी–कर्मचारियों को ये गाड़ियां सिर्फ फील्ड विजिट और शासकीय कार्यों के लिए दी जाती हैं, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। कई अधिकारी इन्हीं गाड़ियों से रोज़ाना अम्बिकापुर आना–जाना करते हैं। नतीजा ये कि सरकारी डीजल जलता है, और जनता के पैसों पर अधिकारी ऐश करते हैं। हैरानी की बात ये है कि इस खेल की जानकारी जिले के मुखिया तक को है, फिर भी अब तक किसी पर कार्रवाई नहीं हुई।

लापरवाही का आलम ये है कि कलेक्टर निवास से महज़ 20 मीटर की दूरी पर स्थित छात्रावास में अधीक्षक रात में ड्यूटी से नदारद पाए जाते हैं। जबकि इसी जिले में लापरवाही के चलते कई आदिवासी छात्रों की मौत हो चुकी है। सवाल ये है कि ऐसी गंभीर लापरवाही पर आंख मूंदकर बैठा प्रशासन आखिर किसका संरक्षण कर रहा है?

शिक्षा विभाग की स्थिति भी कम शर्मनाक नहीं। विभाग के कई अधिकारी और शिक्षक कामकाज छोड़कर दूसरे विभागों में घंटों बैठकर वक्त काटते हैं। कई शिक्षक तो अब विद्यालय का रुख ही नहीं करते, लेकिन विभाग में पकड़ इतनी मज़बूत है कि बिना पढ़ाए हर महीने वेतन समय पर मिल जाता है,, शिक्षको को अटैच नहीं करने को लेकर सरकार से सभी कलेक्टरों को आदेश जारी किया गया है बावजूद इसके जिले में अटैचमेंट का खेल धड़ल्ले से जारी है मतलब सरकार के आदेशों को ठेंगा दिखाया जा रहा है

RES और PMGSY विभाग जैसे अधिकारियों के कारनामे किसी से छुपे नहीं हैं। उनके कामकाज की चर्चा पूरे जिले में है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सन्नाटा पसरा है। पत्रकारों के द्वारा विभाग के खबर लगाए जाने के बाद कलेक्टर साहब के सहयोग से उसका खंडन भी छापे जाते हैं और साहब मोन समर्थन करते हैं जनमन योजना से बनी सड़कों में जमकर भ्रष्टाचार हो रहा है और विभाग के अधिकारी देश के प्रधानमंत्री के सपनों में खुलेआम पलीता लगा रहे है लेकिन जब पत्रकार इन सब खबरों को कवर करता है तो जिम्मेदार अधिकारी सुधार के बजाय पत्रकारों को ही दोषी ठहराने में जुट जाते है

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—जनता के पैसों पर ऐश करने वाले इन अधिकारियों को आखिर कब लगाम लगेगी?

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