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धनेशपुर में मातम—गर्भवती बहुएं, मासूम पोता-पोती और बुजुर्ग महिला की एक साथ उठी अर्थियां


17 साल से बिना मरम्मत का बांध टूटा, एक ही परिवार के 5 सदस्य बह गए

धनेशपुर में मातम—गर्भवती बहुएं, मासूम पोता-पोती और बुजुर्ग महिला की एक साथ उठी अर्थियां

हादसे से पहले चेतावनी के बावजूद जल संसाधन विभाग ने दी थी “ओके” रिपोर्ट

छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में सरकारी लापरवाही ने एक परिवार को पूरी तरह खत्म कर दिया। धनेशपुर गांव का 43 साल पुराना साड़सा लुत्ती बांध मंगलवार देर रात टूटा और रामवृक्ष खैरबार का पूरा परिवार बह गया। शुक्रवार को गमगीन माहौल में पांच अर्थियां एक साथ उठीं। मां, दो बहुएं (दोनों गर्भवती), पोता और पोती मिट्टी में सदा के लिए समा गए।

मौत का मंजर—रामवृक्ष तैरकर बचे, पूरा परिवार बह गया

रामवृक्ष खैरबार ने अपनी आंखों के सामने सबकुछ खो दिया। पत्नी बतशिया (61), बहुएं चिंता (35) और रजंती (28), पोता कार्तिक (6) और पोती प्रिया (9) बाढ़ में बह गए। अब भी तीन साल की मासूम वंदना और बुजुर्ग जितन खैरवार (65) लापता हैं। रामवृक्ष बच तो गए, लेकिन अब बोलने की हालत में नहीं हैं। गांववालों का कहना है—“उनकी आंखों से बस आंसू बहते हैं, शब्द नहीं निकलते।”

अंतिम यात्रा—अर्थियों के साथ टूटा गांव

गांव ने शुक्रवार को भयावह दृश्य देखा। पांचों शव जब बलरामपुर मॉर्च्युरी से लाए गए तो हर किसी की आंखें नम थीं। परंपरा के अनुसार बतशिया का दाह-संस्कार किया गया। जबकि गर्भवती होने की वजह से रजंती और चिंता को दफनाया गया। उनके साथ मासूम प्रिया और कार्तिक को भी मिट्टी में सुला दिया गया।
रामवृक्ष ने कांपते हाथों से पत्नी को मुखाग्नि दी। दोनों बेटे गणेश और सजिवन, जो मजदूरी के लिए चेन्नई गए थे, अब टूट चुके हैं। जिस घर को वे दो महीने पहले हंसते-खेलते छोड़कर गए थे, वह अब खंडहर में बदल चुका है।

प्रशासन की लापरवाही—चेतावनी के बाद भी कार्रवाई नहीं

गांववालों ने हादसे से पहले ही अधिकारियों को खतरे की चेतावनी दी थी। 27 अगस्त को जल संसाधन विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचे, फोटो खींची और बांध के मेढ़ में दरारें देखीं। लेकिन रिपोर्ट में सबकुछ “ठीक” बताया और लौट गए।
सिर्फ दो दिन बाद लगातार बारिश हुई और बांध ओवरफ्लो होने लगा। अधिकारियों ने कोई कदम नहीं उठाया। मंगलवार रात बांध का 35 मीटर हिस्सा टूटा और तबाही मच गई।

संक्रमण का खतरा—गांव दहशत में

चार परिवारों के घर पूरी तरह बह चुके हैं। लोग अस्थायी तौर पर स्कूलों और आंगनबाड़ी में रह रहे हैं। राहत सामग्री नहीं पहुंची है।
सैकड़ों मवेशी भी बाढ़ में बहकर मर गए। अब उनके शव सड़ने लगे हैं। दुर्गंध और संक्रमण का खतरा गांव को और डरा रहा है। कुत्ते मवेशियों के शव नोच रहे हैं, जिससे हालात और बिगड़ सकते हैं।

सवालों के घेरे में विभाग

गांववालों का कहना है—अगर समय रहते बांध की मरम्मत होती और चेतावनी को गंभीरता से लिया जाता, तो पांच जानें बच सकती थीं। अब सवाल यह है कि—

बांध की मरम्मत 17 साल से क्यों नहीं हुई?

खतरे की सूचना मिलने के बाद भी अधिकारी “ओके रिपोर्ट” देकर क्यों लौट गए?

हादसे के चार दिन बाद तक राहत और बचाव के इंतजाम क्यों अधूरे हैं?


धनेशपुर की यह त्रासदी सिर्फ एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही का नतीजा है।

मिट्टी में दफ़न

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