बलरामपुर में सामूहिक कन्या विवाह के दौरान सियासी नाराजगी, आमंत्रण पत्र को लेकर भाजपा पदाधिकारी मंच से दूर

बलरामपुर में मुख्यमंत्री सामूहिक कन्या विवाह योजना के तहत 150 जोड़ों का विवाह समपन्न, आमंत्रण पत्र को लेकर राजनीतिक नाराजगी
बलरामपुर जिले में आज मुख्यमंत्री सामूहिक कन्या विवाह योजना के अंतर्गत 150 जोड़ों का विवाह कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री वर्चुअल माध्यम से जुड़े। विवाह समारोह की तैयारियों को लेकर स्थानीय प्रशासन और महिला एवं बाल विकास विभाग ने कई दिनों से व्यापक स्तर पर व्यवस्थाएं की थीं।
हालांकि, विवाह कार्यक्रम के दौरान उस समय राजनीतिक हलचल मच गई, जब सत्तासीन भाजपा के कुछ पदाधिकारी आमंत्रण पत्र में नाम न होने से नाराज हो गए। नाराज पदाधिकारियों ने मंच पर जाने के बजाय दर्शक दीर्घा में बैठकर अपना विरोध दर्ज कराया। विरोध कर रहे पदाधिकारियों का कहना था कि उन्हें कार्यक्रम के आमंत्रण पत्र में स्थान नहीं दिया गया।

स्थिति को संभालने के लिए स्थानीय प्रशासन तत्काल सक्रिय हुआ और नाराज माननीयों से बातचीत कर उन्हें शांत कराया। इसके बाद विवाह कार्यक्रम पुनः अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ा।
मुख्यमंत्री सामूहिक कन्या विवाह योजना के अंतर्गत आयोजित इस कार्यक्रम में पहले कैबिनेट मंत्री रामविचार नेताम और सरगुजा सांसद चिंतामणि महराज को बतौर अतिथि शामिल होना था, लेकिन अपरिहार्य कारणों से वे कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो सके। इसके पश्चात सामरी विधायक उदेश्वरी पैंकरा ने कार्यक्रम में पहुंचकर नवविवाहित जोड़ों को आशीर्वाद प्रदान किया।
कार्यक्रम की रूपरेखा पूरी तरह प्रोटोकॉल के अनुरूप बताई जा रही है। आमंत्रण पत्र में सांसद, विधायक, जिला पंचायत अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, जनपद अध्यक्ष और नगर पालिका अध्यक्ष के नाम अंकित थे। इसी प्रोटोकॉल को लेकर विवाद खड़ा हुआ। आमंत्रण पत्र में नाम न होने से नाराज भाजपा जिलाध्यक्ष ओमप्रकाश जायसवाल, पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्य कृष्णा गुप्ता, जनपद उपाध्यक्ष बबली संबल और नगर पालिका उपाध्यक्ष दिलीप सोनी मंच पर नहीं पहुंचे और दर्शक दीर्घा में बैठकर विरोध जताते नजर आए।
बहरहाल, स्थानीय प्रशासन की पहल के बाद नाराज माननीयों को मना लिया गया। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि जब कार्यक्रम पूरी तरह सरकारी था, तब राजनीतिक पदाधिकारियों के नाम आमंत्रण पत्र में शामिल किए जाने को लेकर विवाद क्यों उत्पन्न हुआ। साथ ही, सीमित कार्यकाल वाले आयोगों के सदस्यों की भूमिका और प्रोटोकॉल को लेकर भी असमंजस की स्थिति बनी रही।
हालांकि, वैवाहिक कार्यक्रमों में इस तरह की नोकझोंक कोई नई बात नहीं है, लेकिन सरकारी आयोजन में इस प्रकार की नाराजगी ने प्रशासनिक व्यवस्था और प्रोटोकॉल की समझ पर सवाल जरूर खड़े किए हैं।


