साहब के चरणों में व्यवस्था, फाइलों में सुशासन! मीटिंग में आंकड़े गायब, गलियारों में रसूख की चर्चा… आखिर किस भरोसे चल रहा है विभाग?

बलरामपुर।
सरकारी दफ्तरों में इन दिनों एक विभाग की कार्यशैली चर्चा का विषय बनी हुई है। आरोप नहीं, बल्कि विभागीय गलियारों में चल रही चर्चाएं कई ऐसे सवाल खड़े कर रही हैं, जिनका जवाब शायद केवल जिम्मेदार अधिकारी ही दे सकते हैं। कहा जा रहा है कि जहां आम लोगों के कार्यों की बात आती है, वहां नियमों की लंबी फेहरिस्त सामने रख दी जाती है, लेकिन रसूखदारों और करीबी लोगों के मामलों में वही नियम कुछ नरम पड़ते नजर आते हैं।
सूत्रों के अनुसार विभाग की समीक्षा बैठकों में कई बार ऐसे हालात बनते हैं, जहां सवाल तो विस्तार से पूछे जाते हैं, लेकिन जवाब देने के लिए आवश्यक आंकड़े और तथ्य पर्याप्त नहीं होते। चर्चा है कि कई अवसरों पर बेसिक जानकारी तक प्रस्तुत करने में कठिनाई हुई, जबकि आत्मविश्वास ऐसा दिखाई दिया मानो पूरे विभाग की व्यवस्था पूरी तरह नियंत्रण में हो। बैठक समाप्त होने के बाद कर्मचारियों के बीच आंकड़ों से ज्यादा तैयारी और कार्यशैली की चर्चा होती रही।
विभाग के भीतर यह भी कानाफूसी है कि कुछ कर्मचारियों पर नियम-कायदों का सख्ती से पालन कराया जाता है, जबकि कुछ चुनिंदा लोगों के लिए वही नियम लचीले हो जाते हैं। कर्मचारियों के बीच यह तंज भी सुनाई देता है कि यहां काम से अधिक महत्व “कनेक्शन” और “पहचान” का है।
सूत्रों का दावा है कि विभाग में पदस्थ एक अधिकारी अपनी सहज बातचीत और व्यवहार से सामने वाले का विश्वास जीतने में माहिर माने जाते हैं। हालांकि विभागीय चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि बलरामपुर में पदस्थापना के बाद कई मामलों को लेकर उनका नाम विवादों में रहा, लेकिन इसके बावजूद वे अधीनस्थ कर्मचारियों को नियम-कानून और अनुशासन का पाठ पढ़ाने में पीछे नहीं रहते।
विभागीय गलियारों में यह चर्चा भी है कि अपने संभागीय प्रमुख के सेवानिवृत्त होने के बाद संबंधित अधिकारी उच्च पद की दौड़ में भी शामिल थे। हालांकि, चर्चाओं के अनुसार उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी।
इस बीच सबसे बड़ा सवाल जवाबदेही को लेकर उठ रहा है। यदि समीक्षा बैठकों में ही आवश्यक तैयारी और तथ्यात्मक जानकारी का अभाव दिखाई देता है, तो आम नागरिकों को समयबद्ध और गुणवत्तापूर्ण सेवाएं कैसे मिलेंगी? यह प्रश्न अब केवल कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आम लोगों के बीच भी चर्चा का विषय बनता जा रहा है।
अब निगाहें विभागीय नेतृत्व पर हैं। देखना होगा कि इन चर्चाओं को महज अफवाह मानकर नजरअंदाज किया जाता है या फिर निष्पक्ष समीक्षा कर यह संदेश दिया जाता है कि सरकारी व्यवस्था में नियम, पारदर्शिता और जवाबदेही किसी भी व्यक्ति के रसूख से ऊपर है।



