पांच दशक से रामानुजगंज में मां दुर्गा की प्रतिमाएं बना रहा बंगाल का परिवार, पिता के बाद बेटे ने संभाली परंपरा
तीन पीढ़ियों से जुड़ी है मूर्तिकला की परंपरा; कल खुलेंगे माता रानी के पट, श्रद्धालुओं को होंगे दर्शन

पांच दशक से रामानुजगंज में मां दुर्गा की प्रतिमाएं बना रहा बंगाल का परिवार, पिता के बाद बेटे ने संभाली परंपरा
पुरुलिया से हर साल नवरात्र से एक महीने पहले पहुंचते हैं कारीगर, तीन पीढ़ियों से जुड़ी है मूर्तिकला की परंपरा; कल खुलेंगे माता रानी के पट, श्रद्धालुओं को होंगे दर्शन
बलरामपुर। छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के रामानुजगंज में शारदीय नवरात्र के अवसर पर मां दुर्गा की प्रतिमाएं तैयार करने में जुटे पश्चिम बंगाल के एक परिवार की कहानी आस्था, मेहनत और परंपरा की मिसाल है। पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले से आने वाला यह परिवार पिछले करीब पांच दशक से रामानुजगंज में मां दुर्गा की प्रतिमाएं बना रहा है। पिता से शुरू हुई इस परंपरा को अब बेटे आगे बढ़ा रहे हैं। हर साल नवरात्र से करीब एक महीने पहले परिवार के सदस्य और अन्य कारीगर रामानुजगंज पहुंचते हैं और दिन-रात मेहनत कर प्रतिमाओं को अंतिम रूप देते हैं।

इस वर्ष भी कारीगर मां दुर्गा की प्रतिमाओं को सजाने-संवारने में जुटे हैं। करीब एक महीने की मेहनत और साधना के बाद तैयार हो रही प्रतिमाओं के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं को अब माता रानी के पट खुलने का इंतजार है। कल पट खुलने के साथ ही श्रद्धालु मां दुर्गा के दर्शन कर सकेंगे।

पिता ने शुरू किया था रामानुजगंज आने का सिलसिला
पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के रहने वाले 64 वर्षीय दुर्गा दास सूत्रधार बताते हैं कि रामानुजगंज में मां दुर्गा की प्रतिमाएं बनाने की परंपरा उनके पिता काशीनाथ सूत्रधार ने शुरू की थी। उनके पिता हर साल पश्चिम बंगाल से रामानुजगंज आकर प्रतिमाएं तैयार करते थे। उस समय मध्य बाजार स्थित पीपल चौक के पास केवल एक स्थान पर मां दुर्गा की प्रतिमा बनाई जाती थी।
दुर्गा दास बताते हैं कि जब उनकी उम्र करीब 15 वर्ष थी, तब वे भी अपने पिता के साथ रामानुजगंज आने लगे। शुरुआत में उन्होंने पिता के साथ रहकर मूर्ति बनाने की कला सीखी। धीरे-धीरे यह काम उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया। आज करीब पांच दशक से वे लगातार रामानुजगंज आकर मां दुर्गा की प्रतिमाएं तैयार कर रहे हैं।

एक महीने पहले पहुंचकर शुरू करते हैं काम
दुर्गा दास सूत्रधार के अनुसार, हर साल शारदीय नवरात्र से करीब एक महीने पहले वे अपने परिवार और सहयोगियों के साथ रामानुजगंज पहुंच जाते हैं। यहां रहकर वे पूजा समितियों के लिए मां दुर्गा की प्रतिमाएं तैयार करते हैं। वर्तमान में उनके जिम्मे रामानुजगंज के दो से तीन पूजा पंडालों के लिए प्रतिमाएं बनाने का काम रहता है।
प्रतिमा निर्माण की प्रक्रिया में मिट्टी से आकार देने से लेकर रंग भरने और सजावट करने तक कई चरण शामिल होते हैं। प्रत्येक चरण में बारीकी और धैर्य की जरूरत होती है। निर्धारित समय पर प्रतिमाएं तैयार करने के लिए दुर्गा दास अपने बेटे और अन्य कारीगरों के साथ लगातार मेहनत करते हैं।
बेटे सुमन ने भी संभाली पारिवारिक विरासत
दुर्गा दास सूत्रधार के छोटे बेटे सुमन सूत्रधार भी अपने पिता की कला और परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। सुमन बताते हैं कि उन्हें मां दुर्गा की प्रतिमाएं बनाते हुए करीब दस साल हो चुके हैं। इस वर्ष भी वे अपने पिता के साथ रामानुजगंज पहुंचे हैं और प्रतिमा निर्माण में सहयोग कर रहे हैं।
सुमन ने अपने पिता के साथ काम करते हुए मूर्ति बनाने की बारीकियां सीखी हैं। फिलहाल उन्हें प्रतिमाओं पर मिट्टी लगाने और रंग भरने का काम अच्छी तरह आता है। वे धीरे-धीरे इस कला के दूसरे पहलुओं में भी अपनी दक्षता बढ़ा रहे हैं।

बंगाल की कला और रामानुजगंज की आस्था का संगम
रामानुजगंज में दुर्गा दास सूत्रधार और उनके परिवार का हर साल पहुंचना अब नवरात्र की तैयारियों का अहम हिस्सा बन चुका है। एक ओर पूजा समितियां पंडालों को सजाने में जुटी रहती हैं, तो दूसरी ओर यह परिवार मां दुर्गा की प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में लगा रहता है।
करीब पांच दशक से जारी यह सिलसिला केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही कला और परंपरा को जीवित रखने का प्रयास भी है। पश्चिम बंगाल के पुरुलिया से रामानुजगंज तक हर साल का यह सफर दोनों क्षेत्रों के बीच आस्था और सांस्कृतिक जुड़ाव को भी दर्शाता है।
एक महीने की मेहनत के बाद अब दर्शन की बारी
करीब एक महीने तक लगातार मेहनत कर तैयार की गईं मां दुर्गा की प्रतिमाएं अब श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए तैयार हैं। कल माता रानी के पट खुलने के साथ ही पूजा पंडालों में भक्तों की आवाजाही शुरू होगी। जिन प्रतिमाओं को कारीगरों ने अपने हाथों से आकार दिया है, उनके सामने श्रद्धालु शीश झुकाकर सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करेंगे। दुर्गा दास सूत्रधार का परिवार भी अपनी मेहनत को प्रतिमाओं के रूप में साकार होते देखेगा। इस तरह पिता से शुरू हुई परंपरा एक बार फिर आस्था के इस पर्व पर अपनी पहचान दर्ज कराएगी।



