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खंडन से नहीं बचेगा भ्रष्टाचार — कलेक्टर ने भी मानी थी निर्माण में गड़बड़ी

ANAND MISHRA OFFICIAL PRESENTS

PMGSY विभाग की घटिया कार्यप्रणाली उजागर — मिट्टी से बनी ‘नाली’ पर लीपापोती, कलेक्टर भी मान गए निर्माण में गड़बड़ी

“जब जवाबदेही मर जाती है, तब खंडन जनसंपर्क से जारी होता है!”

जिले में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के अंतर्गत बन रही एक नाली ने पूरे विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लाखों की लागत से बनाई जा रही यह नाली “सीमेंट” या “कंक्रीट” से नहीं, बल्कि मिट्टी से बनाई गई थी। जैसे ही यह मामला उजागर हुआ, विभाग की नींद टूटी — लेकिन सुधार करने की बजाय, जनसंपर्क के ज़रिए खंडन जारी कर अपनी गलती ढकने की कोशिश की गई। Khabar30.in की 13may 2026 की खबर पर खुद PMGSY के अधिकारी ने खंडन छपवाने के बहाने खुद लगाई मोहर PMGSY खुद माना की  लगभग 30 मीटर नली मिट्टी की बनी हुई है अगर मिट्टी की नहीं बनी हुई है तो अधिकारी को क्यों तुड़वानी परी बनी हुई नाली

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EE साहब 10 तारीख से लगातार इस मामले में अपना पक्ष रखने से बचते रहे इस मामले जब हमने कलेक्टर की संज्ञान में डाला तो कलेक्टर ने बताया कि काम तो वास्तव में मिट्टी का हुआ है मैं भी इसे देखा है और इसे तुड़वाने का उसे निर्देश दिया है और कहीं भी दूसरी जगह काम हुए हैं तो सभी को तुड़वाय जाएंगे EE जानबूझकर मीडिया के सामने अपने पक्ष रखने से बचते रहे हैं 



जब पत्रकारों ने PMGSY विभाग के ज़िम्मेदार अधिकारियों से सीधा सवाल करना चाहा, तो वे ‘व्यस्त’ होने का बहाना बनाकर संवाद से भागते नज़र आए। सवाल यह है कि अगर निर्माण में सब कुछ ठीक था, तो फिर खंडन की ज़रूरत क्यों पड़ी?

इस पूरे प्रकरण को लेकर जब खबर जिला कलेक्टर  राजेंद्र कटारा के संज्ञान में लाई गई, तो उन्होंने स्वयं माना कि नाली मिट्टी से बनी है और इसे तुड़वाकर सही निर्माण करवाने के आदेश दिए गए हैं। सवाल उठता है — जब अधिकारी स्वयं मान रहे हैं कि निर्माण गलत है, तो क्या अब सिर्फ खंडन छपवाकर विभाग अपनी जिम्मेदारी से बच सकता है?

जनता के टैक्स के पैसों से बनी इस नाली का ऐसा हाल क्यों?

क्या इसका जिम्मेदार सिर्फ छोटा ठेकेदार है?

क्या विभागीय अभियंता और सुपरविजन टीम की कोई जवाबदेही नहीं है?

क्या केवल अखबार में खंडन छपवाकर मामला रफा-दफा किया जाएगा?


यह कोई पहली घटना नहीं है। अक्सर देखा गया है कि PMGSY जैसे बड़े योजनाओं में ज़मीनी हकीकत और कागज़ी रिपोर्टों में ज़मीन-आसमान का अंतर होता है। और जब भी सच्चाई उजागर होती है, तो प्रेस पर दबाव, प्रचार के ज़रिए सफाई, और नीचे स्तर पर कार्यवाही कर ऊपर बैठे लोगों को बचाने की कोशिश शुरू हो जाती है।

अब असली परीक्षा जिला प्रशासन की है।
कलेक्टर राजेंद्र कटारा के पास अब यह ज़िम्मेदारी है कि वे सिर्फ बयानबाज़ी तक न सीमित रहें, बल्कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराएं और दोषियों — चाहे वे किसी भी पद पर हों — के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करें।

अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह स्पष्ट संकेत होगा कि भ्रष्टाचार, ढिलाई और लीपापोती को प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त है।

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