जाति प्रमाण पत्र विवाद : विधायक पोर्ते सवालों से घिरीं, भाजपा पर भी दबाव बढ़ा

बलरामपुर जिला एक बार फिर राजनीतिक तनाव का केंद्र बन गया है। प्रतापपुर से भाजपा विधायक शकुंतला सिंह पोर्ते पर लगे कथित फर्जी ST प्रमाण पत्र के आरोपों ने प्रशासन से लेकर पार्टी संगठन तक सभी को असहज कर दिया है। मामला अब सिर्फ एक प्रमाण पत्र का नहीं, बल्कि एक आरक्षित सीट और आदिवासी समुदाय के अधिकारों की रक्षा का सवाल बन गया है।


आरोप गंभीर, जवाब नदारद
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि विधायक पोर्ते का ST प्रमाण पत्र पति की जाति के आधार पर वर्ष 2002-03 में जारी हुआ था, जबकि वह मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मऊ जिले की निवासी बताई जाती हैं, जहां गोंड समुदाय OBC में आता है।
ये आरोप भले अभी साबित नहीं हुए हैं, लेकिन समिति द्वारा मांगे गए दस्तावेजों का अभाव इस विवाद को और भारी बना रहा है।

- जिला स्तरीय जाति सत्यापन समिति ने जन्म प्रमाण पत्र, वंशावली, स्कूल रिकॉर्ड जैसे मूल दस्तावेज मांगे
- तीन नोटिस भेजे गए
- विधायक की ओर से एक भी नोटिस का जवाब नहीं
अभिलेखागार में जरूरी रिकॉर्ड न मिलने की जानकारी ने भी सवालों को और मजबूती दी है।
27 नवंबर की सुनवाई ने माहौल बदला
27 नवंबर को निर्धारित सुनवाई में बड़ी संख्या में आदिवासी समाज उपस्थित हुआ। समिति, शिकायतकर्ता और गवाह सब मौजूद थे।
लेकिन विधायक खुद नहीं पहुंचीं। उनकी ओर से केवल वकील पहुंचे और तारीख आगे बढ़ाने का आग्रह किया।
समिति ने तारीख बढ़ाकर 11 दिसंबर कर दी।
यहीं से मामला भड़क गया।
कलेक्टर कार्यालय घिरा, NH 343 जाम


तारीख बढ़ने की खबर फैलते ही हजारों आदिवासी कलेक्टोरेट पहुंचे।
गुस्सा साफ था। भीड़ का सवाल था कि
“अगर प्रमाण पत्र सही है, तो दस्तावेज क्यों नहीं दिखाए जा रहे।”
- छह घंटे तक धरना
- बाद में भीड़ NH 343 पर पहुंची और जाम लगा दिया
- प्रशासन ने अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए
- हालात संवेदनशील बने रहे
समुदाय ने साफ कहा कि बिना लिखित आश्वासन के आंदोलन खत्म नहीं होगा।
आखिरकार लिखित वादा

देर रात प्रशासन ने लिखित में आश्वासन दिया कि
11 दिसंबर को पूरी और अंतिम सुनवाई की जाएगी
और प्रक्रिया उसी दिन पूरी करने का प्रयास होगा।
इसके बाद धरना खत्म हुआ, लेकिन लोगों के गुस्से की दिशा नहीं बदली।
मांगें सख्त, दबाव और बढ़ा
शिकायतकर्ता और आदिवासी संगठनों ने चार प्रमुख मांगें रखीं:
- विधायक का जाति प्रमाण पत्र निरस्त हो
- कथित फर्जीवाड़े पर FIR दर्ज की जाए
- विधायक की सदस्यता रद्द की जाए
- सभी दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं
उनका कहना है कि यह सिर्फ एक मामले की बात नहीं, बल्कि आरक्षित सीटों की रक्षा का मुद्दा है।
भाजपा पर भी सवाल
भाजपा इस पूरे विवाद को विपक्ष की साजिश बता रही है।
लेकिन पार्टी इन सवालों से घिरी है:
- विधायक नोटिसों का जवाब क्यों नहीं दे रहीं
- लगातार सुनवाई से अनुपस्थिति क्यों
- दस्तावेज अभिलेखागार में क्यों नहीं मिल रहे
- क्या भाजपा अपने ही विधायक पर कार्रवाई से बच रही है
प्रदेश की राजनीति में यह चर्चा तेज हो गई है कि पार्टी जनता के विश्वास और आदिवासी समाज की नाराजगी के बीच संतुलन नहीं साध पा रही।










अब सबकी निगाहें 11 दिसंबर पर
11 दिसंबर सिर्फ एक तारीख नहीं, निर्णायक दिन की तरह देखा जा रहा है।
यदि विधायक दस्तावेज लेकर नहीं आतीं, तो विवाद और अधिक गंभीर होगा।
समिति की रिपोर्ट हाईकोर्ट जाने वाली है, इसलिए प्रशासन पर भी जिम्मेदारी अधिक है।
आदिवासी समाज का स्पष्ट संदेश है:
“या तो सबूत रखो, या पद छोड़ो।”
प्रतापपुर से लेकर रायपुर तक, और भाजपा दफ्तर से लेकर प्रशासनिक गलियारों तक, हर जगह एक ही सवाल गूंज रहा है कि क्या 11 दिसंबर इस विवाद का सच सामने लाएगी या राजनीतिक खाई और गहरी होगी।




