रामानुजगंज की धरोहर पर वक्त की मार, 92 साल बाद भी बुलंद है 1934 का पुराना अस्पताल सरगुजा स्टेट की निर्माण कला की मिसाल यह ऐतिहासिक इमारत अब संरक्षण के इंतजार में
1934 में बनी सरगुजा स्टेट की यह ऐतिहासिक इमारत अब संरक्षण को तरस रही

92 साल पुरानी इमारत आज भी बुलंद, मगर संरक्षण के इंतजार में रामानुजगंज का इतिहास
1934 में महाराजा रामानुज शरण सिंहदेव ने बनवाया था अस्पताल, आज इसी भवन में संचालित हो रहा किशोर न्यायालय
कभी दूर-दराज से इलाज कराने पहुंचते थे लोग, अब बारिश में छत से टपकता है पानी; सरगुजा स्टेट की निर्माण कला की जीवंत निशानी को संरक्षण की दरकार
बलरामपुर/रामानुजगंज। शहर बदल गया, दौर बदल गया, इलाज के तौर-तरीके बदल गए, लेकिन थाना रोड पर खड़ी 92 साल पुरानी एक इमारत आज भी रामानुजगंज के इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए है। वर्ष 1934 में तत्कालीन सरगुजा स्टेट के महाराजा रामानुज शरण सिंहदेव ने जिस भवन का निर्माण अस्पताल के रूप में कराया था, वह आज भी अपने मूल स्वरूप में मौजूद है। कभी इस भवन में इलाज के लिए दूर-दराज से लोग पहुंचते थे, मरीजों के ठहरने की व्यवस्था थी और अच्छे डॉक्टर सेवाएं देते थे। आज उसी ऐतिहासिक भवन में किशोर न्यायालय संचालित हो रहा है।
विडंबना यह है कि जिस इमारत ने दशकों तक लोगों को सुविधा दी, वही आज संरक्षण के अभाव में उपेक्षा की मार झेल रही है। बारिश के मौसम में छत से कई जगह पानी टपकता है। भवन के कुछ हिस्सों में मरम्मत की जरूरत दिखाई देती है। हालांकि इमारत का मूल ढांचा अब भी मजबूती से खड़ा है, लेकिन समय पर संरक्षण नहीं मिला तो यह ऐतिहासिक धरोहर धीरे-धीरे जर्जर हो सकती है।
जब रामानुजगंज में अस्पताल होना बड़ी बात थी
आज अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र आम बात हैं, लेकिन 1934 का दौर अलग था। रामानुजगंज में आधुनिक सुविधाएं सीमित थीं। ऐसे समय में महाराजा रामानुज शरण सिंहदेव द्वारा अस्पताल का निर्माण कराया जाना इस क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।
नगर के वयोवृद्ध निवासी सुभाष जायसवाल बताते हैं कि पुराने समय में यह अस्पताल आसपास के लोगों के लिए इलाज का प्रमुख केंद्र था। यहां डॉक्टर सेवाएं देते थे और मरीजों के रहने की भी व्यवस्था थी। उनके अनुसार उस समय रामानुजगंज में अस्पताल, थाना और स्कूल प्रमुख इमारतों में शामिल थे।

महाराजा के नाम से बसा रामानुजगंज
रामानुजगंज को बसाने का श्रेय तत्कालीन सरगुजा स्टेट के महाराजा रामानुज शरण सिंहदेव को दिया जाता है। बताया जाता है कि क्षेत्र का पुराना नाम बोहला था। महाराजा ने यहां लोगों को बसाया, बाजार विकसित कराया और उनके नाम पर शहर का नाम रामानुजगंज पड़ा।
इसी दौर में शहर में अस्पताल सहित कई महत्वपूर्ण निर्माण कराए गए। आज इनमें से कुछ इमारतें अपना मूल स्वरूप खो चुकी हैं, लेकिन पुराना अस्पताल भवन अब भी उस दौर की कहानी कह रहा है।

इंजीनियर से लेकर ठेकेदार तक दर्ज है नाम
इस भवन की खासियत सिर्फ इसकी उम्र नहीं है, बल्कि इसके निर्माण से जुड़ी जानकारी भी इसे महत्वपूर्ण बनाती है। भवन का डिजाइन पंडित चंद्र शेखर शर्मा, सीई एवं स्टेट इंजीनियर, सरगुजा स्टेट ने तैयार किया था।
इसका निर्माण मैसर्स हीरालाल एंड ब्रदर्स, इंजीनियर, बिल्डर्स एंड स्टेट कॉन्ट्रैक्टर्स, सरगुजा स्टेट ने कराया था।
करीब नौ दशक बाद भी भवन का मूल ढांचा मौजूद होना उस दौर की निर्माण तकनीक, सामग्री और कारीगरी की मजबूती को दर्शाता है।
जिस स्कूल में पढ़े सुभाष, उसके सामने था अस्पताल
वयोवृद्ध निवासी सुभाष जायसवाल बताते हैं कि अस्पताल के सामने महारानी बृजेश्वरी हाई स्कूल हुआ करता था। उन्होंने इसी स्कूल में दूसरी कक्षा से मैट्रिक तक पढ़ाई की।
उनकी यादों में वह पूरा इलाका आज भी पुराने रामानुजगंज की तस्वीर सामने ला देता है। एक तरफ स्कूल, दूसरी ओर अस्पताल और आसपास थाना भवन। समय के साथ स्कूल की पुरानी इमारत बदल गई, नई इमारतें बन गईं, लेकिन अस्पताल भवन अब भी उसी दौर की निशानी के रूप में खड़ा है।
मंदिरों से भी जुड़ी है महाराजा की विरासत
महाराजा रामानुज शरण सिंहदेव के समय रामानुजगंज में धार्मिक और सामाजिक महत्व के कई निर्माण हुए। सुभाष जायसवाल के अनुसार महाराजा ने मां महामाया मंदिर और राम मंदिर की स्थापना भी कराई थी।
कन्हर नदी के तट के पास स्थित ये मंदिर आज भी शहर की आस्था का प्रमुख केंद्र हैं। ऐसे में अस्पताल भवन, पुराने मंदिर और अन्य ऐतिहासिक संरचनाएं मिलकर रामानुजगंज के शुरुआती विकास की कहानी बयां करती हैं।
अस्पताल बनाने वाले परिवार की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं
पुराने अस्पताल भवन के निर्माण से जुड़ी जानकारी चौधरी हीरालाल के परिवार से भी मिलती है। चौधरी हीरालाल के छोटे भाई के पोते दिनेश गुप्ता बताते हैं कि अस्पताल का निर्माण उनके दादाजी की फर्म हीरालाल एंड ब्रदर्स ने कराया था।
उनके अनुसार रामानुजगंज का पुराना थाना भवन भी इसी फर्म ने बनाया था और दोनों भवनों का निर्माण करीब 1934 के आसपास हुआ था।
दिनेश गुप्ता के अनुसार चौधरी हीरालाल सरगुजा स्टेट के स्टेट कॉन्ट्रैक्टर थे। परिवार में चार भाई थे। सबसे बड़े चौधरी हीरालाल, दूसरे चौधरी जवाहरलाल, तीसरे मोतीलाल और सबसे छोटे चौधरी मोहरलाल थे। मोतीलाल सरगुजा स्टेट के खजांची और चौधरी मोहरलाल स्टेट के तहसीलदार थे।

नई इमारतें मरम्मत मांगने लगीं, यह 92 साल बाद भी खड़ी है
आज निर्माण तकनीक के आधुनिक होने के बावजूद कई नई इमारतों को कुछ वर्षों में ही मरम्मत की जरूरत पड़ जाती है। इसके उलट 92 साल पुराना यह भवन आज भी अपने मूल ढांचे के साथ खड़ा है।
यही वजह है कि यह इमारत केवल एक पुराना भवन नहीं, बल्कि सरगुजा स्टेट के निर्माण कौशल और उस दौर की इंजीनियरिंग की जीवंत मिसाल कही जा सकती है।
लेकिन छत से पानी टपकना और भवन के कुछ हिस्सों का खराब होना चिंता का विषय है। यदि समय रहते मरम्मत और संरक्षण नहीं किया गया तो इतिहास की यह इमारत भी धीरे-धीरे अपनी मजबूती खो सकती है।

धरोहर को सरकारी भवन नहीं, इतिहास की निशानी मानकर संरक्षण की जरूरत
स्थानीय लोगों की मांग है कि प्रशासन इस भवन को केवल वर्तमान में उपयोग हो रही सरकारी इमारत के रूप में न देखे। यह रामानुजगंज के बसने, विकसित होने और आधुनिक सुविधाओं की ओर बढ़ने की कहानी से जुड़ी महत्वपूर्ण धरोहर है।
जिस अस्पताल में कभी इस क्षेत्र के लोगों का इलाज होता था, आज वही भवन रामानुजगंज के इतिहास का इलाज मांग रहा है। समय रहते मरम्मत, संरक्षण और उचित रखरखाव किया गया तो यह 92 साल पुरानी इमारत आने वाली पीढ़ियों को भी उस दौर की कहानी सुनाती रहेगी।



